you are welcome on this blog.you will read i kavitaayen written by me,or my creation.my thoughts about the bitterness of day to day social crimes,bad treditions .
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बुधवार, 23 अप्रैल 2014
मंगलवार, 1 अप्रैल 2014
उन्मत्त परिन्दा (अतुकांत )
तोड़ नीड़ की परिधि
लांघ कर सीमाएं
भुला
नीति रीति
सारी वर्जनाएं
छोड़ संयम की कतार
दे परवाज़ को विस्तार
वशीकरण में बंधा
लिए एक अनूठी चाह
कर बैठा गुनाह
लिया परीरू चांदनी का चुम्बन
जला बैठा अपने पर
उसकी शीतल पावक चिंगारी से
गिरा औंधें मुहँ
नीचे नागफनी ने डसा
खो दिया परित्राण
ना धरा का रहा
ना गगन का
बन बैठा त्रिशंकु
वो उन्मत्त परिंदा
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मंगलवार, 18 मार्च 2014
होली के बाद
होली खेल
कर थका मांदा
अधखुली
पलकों से पलंग पर लेटा था
उसका सर
मेरी पेशानी पर झुका था
उसकी
सुनहरी लटें चेहरे पर
गुदगुदी
पैदा कर रही थी
उसने अधरों की कोमल पंखुड़ियों
से मेरे
गाल को स्पर्श किया
तो उस
वक़्त मैं खुद को
दुनिया का
सबसे खुशकिस्मत इंसान
समझ रहा
था
अचानक दो
गर्म बूंदे मेरे मुख पर पड़ी
उसे आज
जुकाम था
अचानक उसने अपने दो दांत
मेरे गाल
पर गड़ा दिए
मैं चीखा
तो वो हँसने लगी
मैंने लपक
कर उसे बाँहों में
भर लिया
तो पूरा गीला हो गया
फिर मैं जोर से बोला
अजी सुनती
हो इसका डाइपर बदल दो
शुक्रवार, 14 मार्च 2014
होली की शुभकामनायें
होली में मत भूलिये ,आँखें हैं अनमोल|
इक दूजे पर डालिये ,पुष्प रंग के घोल||
पुष्प रंग के घोल ,मलें खुश हों हमजोली|
रहे जोश में होश ,वही है
सच्ची होली||
देखो आये साथियों,होली के हुडदंग|
दरवाजे पर बज रहे,ढ़ोला फाग मृदंग||
ढ़ोला फाग मृदंग, नशेडी नचते आये|
झूमे पीकर भंग ,संग गर्दभ भी लाये||
फेंको
फेंको रंग , भरी कुण्डलिया फेंको| पकड़ो ब्लोगर आज ,छोड़ मत देना देखो||
रविवार, 16 फ़रवरी 2014
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक(ग़ज़ल )
जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक
हीर राँझे की कहानी हो बसी जिसमे
ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक
प्यार का सैलाब जाने कब बहा लाया
हम सदा डरते रहे आँसू बहाने तक
थी बहुत मासूम अपने प्यार की मिटटी
दर्द ही बोते रहे अपने बेगाने तक
क्यों करें परवाह हम अब इस ज़माने की
हर कदम पे जो मिला बस दिल दुखाने तक
छोड़ दी किश्ती भँवर में आज ये साथी
जिंदगी गुजरे फ़कत अब इक फ़साने तक
तू मेरा महबूब अब ये जिंदगी तेरी
खूब गुजरेगी ख़ुदा के पास जाने तक
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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014
जय जय प्रीत दिवस (हास्य व्यंग्य )
कुण्डलिया
चंदा बरसाता अगन ,सूरज देखो ओस
मूँछ एँठ जुगनू कहे ,चल मैं आया बॉस
चल मैं आया बॉस ,शमा को नाच नचाऊं
कर लूँ दो-दो हाथ ,शलभ को प्रीत सिखाऊं
मेरी देख उड़ान ,भाव भँवरे का मंदा
तितली करती डाह ,मिटे फूलों पर चंदा
||तीन दोहे||
दिल सागर में आज क्यों ,उठे प्रेम का ज्वार|
देकर लाल गुलाब को ,करते हैं इजहार||
परसों नभ को दिल दिया,कल धरा को रोज|
चाँद आज मन में बसा,रवि को किया प्रपोज||
कलिका से प्रोमिस करें ,तितली को दें डेट|
इन भँवरों का क्या धरम ,कहें सुमन से वेट||
मंगलवार, 28 जनवरी 2014
नारी के संघर्ष
नारी पत्थर सी हुई
,दिन भर पत्थर तोड़।
उसके दम से घर चले
,पैसा- पैसा
जोड़॥
राह तकें बालक कहीं ,भूखे पेट अधीर।
पूर्ण करेगी काम
ये ,पीकर थोडा नीर॥
तोड़- तोड़ के
गिट्टियां ,हुई सुबह से शाम।
पेट अगन के सामने ,नहीं जटिल ये काम॥
जीवन है संघर्षमय ,किस्मत से
बेहाल।
इन हाथों में शस्त्र हैं ,तसला और कुदाल॥
तोड़ तोड़
पत्थर करें ,उच्च भवन निर्माण।
खुद की सीली
झोंपड़ी,जिसमे निकले प्राण॥
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