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रविवार, 16 फ़रवरी 2014

साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक(ग़ज़ल )

जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक

हीर राँझे की कहानी हो  बसी जिसमे
ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक

प्यार का सैलाब जाने कब बहा लाया
हम सदा डरते रहे आँसू बहाने तक

थी बहुत मासूम अपने प्यार की मिटटी
दर्द ही बोते रहे अपने बेगाने तक

क्यों करें परवाह हम अब इस ज़माने की
हर कदम पे जो मिला बस दिल दुखाने तक 


छोड़ दी किश्ती भँवर में आज ये साथी  
जिंदगी गुजरे फ़कत अब इक फ़साने तक

तू मेरा महबूब अब ये जिंदगी तेरी
खूब गुजरेगी ख़ुदा के पास जाने तक

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रविवार, 8 दिसंबर 2013

बेजुबाँ होते अगर तुम बुत बना देते

२१२२   २१२२  २१२२  २
- "रमल मुसम्मन महजूफ"

मुन्तज़िर अरमाँ सजी दीवार ढा देते 
ऐ खुदा हमको अगर पत्थर बना देते

इक  समंदर हम नया दिल में बसा देते 
तुम अगर  आँसू  हमें पीना सिखा देते

आजिज़ी होती न दिल में तीरगी होती
बेजुबाँ होते अगर तुम बुत बना देते

रूह प्यासी  क्यूँ ये सहरा में खड़ी  होती
प्यार का चश्मा अगर दिल में बहा देते  

दिल मुहब्बत में धड़कता ये हमारा भी
तुम अगर उल्फत भरे नगमे सुना देते

इक फ़सुर्दा फूल चाहत  में हुए तेरी 
फिर  महक जाते अगर तुम मुस्कुरा देते 

      गमज़दा बेशक़, नहीं मगरूर हम देखो 
   लौट आते, तुम अगर मुड़ कर सदा देते

          काँपती चौखट न दीवारें हिला करती
 प्यार  के आधार पर जो घर टिका देते

तल्खियां सब “राज” दिल में दफ्न कर जाती  
 ये जमीं तो क्या सितारे भी दुआ देते
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आजिज़ी=उकताहट
फ़सुर्दा=मुरझाये हुए
मुन्तज़िर=प्रतीक्षारत
तल्खियां =कडवाहट
तीरगी =अँधेरा (गम )