अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती
राधा पग-पग फिरे,विरह बीज बोती
सोच रही काश में ,कान्हा सँग होती
चूम-चूम बाँसुरी,अँसुवन से धोती
मथुरा पँहुच कर सखि,भूले कन्हाई
वृन्दावन नम हुआ ,पसरी तन्हाई
मुरझाई देखता ,बगिया का माली
तक-तक राह जमुना ,भई बहुत काली
खग,मृग, अम्बर, धरा,हँसना
सब भूलें
महुआ जूही कमल ,टेसू ना फूलें
पूछ रही डालियाँ ,कौन
संग झूलें
निष्ठुर, निष्पंद हिय,
उठती हैं हूलें
कोयलिया डार पर ,कुहुक-कुहुक रोई
बीतें जग-जग दिवस ,रतिया न सोई
बिरही पगडंडियाँ , शूल-
शूल बोई
संदेसा भेज दे
,कान्हा को कोई
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