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बुधवार, 11 जून 2014

अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती (कुडंली छंद )

अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती
राधा पग-पग फिरे,विरह बीज बोती
सोच रही काश में ,कान्हा सँग होती
चूम-चूम बाँसुरी,अँसुवन से धोती

मथुरा पँहुच कर सखि,भूले कन्हाई  
वृन्दावन नम हुआ ,पसरी तन्हाई
मुरझाई देखता ,बगिया का माली
तक-तक राह जमुना ,भई बहुत काली

 खग,मृग, अम्बर, धरा,हँसना सब भूलें  
 महुआ जूही  कमल ,टेसू  ना फूलें
 पूछ रही डालियाँ ,कौन संग झूलें   
 निष्ठुर, निष्पंद हिय, उठती हैं हूलें  

कोयलिया डार पर ,कुहुक-कुहुक रोई
बीतें जग-जग दिवस ,रतिया न सोई
बिरही  पगडंडियाँ , शूल- शूल बोई 
 संदेसा भेज दे ,कान्हा  को  कोई    

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रविवार, 11 मई 2014

माँ तेरी इन आँखों में क्यूँ दोरंगी तस्वीर दिखे--(ग़ज़ल )

माँ तेरी इन आँखों में क्यूँ दोरंगी तस्वीर दिखे
इक नदिया से मोती बहते दूजे से क्यूँ नीर दिखे

खुश रह ले तू इस जीवन में ऐसे क्यूँ हालात नहीं
गम को पीकर हँसती है तू पर बातों में पीर दिखे

बेटी अपनी सावित्री या सीता का क़िरदार अगर
दूजे  की बेटी में उनको फिर क्यूँ लैला हीर दिखे

भारत अपनी आजादी की जब दिखलाऐ शान यहाँ
आँखों पर पट्टी  तेरे क्यूँ पैरों में जंजीर दिखे

नारी को पूजा करते थे पहले जग के लोग सभी
क्यूँ मर्दों की नजरों में औरत अपनी ज़ागीर दिखे

जिस नारी को मिलता था इक देवी का सम्मान यहाँ
अब  सामाजिक दर्पण में उसकी झूठी तौक़ीर दिखे

बिसरा देते जो डाली को पतझड़ के आगाज़ बिना
मौसम कहता है फूलों में तहज़ीबी तासीर दिखे

इक-इक मजहब के खेमों में धज्जी-धज्जी जान बटी
भारत माता की सोचूँ तो गर्दिश में तकदीर दिखे

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शुक्रवार, 2 मई 2014

शादी की सेंतीस्वी सालगिरह पर -----

(शादी की सेंतीस्वी सालगिरह पर ) 
कौन कहता है 
नदी के दो छोर मिल नहीं सकते 
मिले तो थे उस रोज,
आज ही के दिन 
जब थामा था हमने इक दूजे का हाथ 
गंगा के उस पार की लहर तुम्हारी 
इस पार की मेरी 
ले आई हम दोनों को कितने करीब 
तुम्हारे विश्वास और मेरे समर्पण 
से बनी एक छोटी सी किश्ती
में ,धारा संग बह चले... 
कितना पूर्ण हुआ 
कितना बाकी ,किसे है परवाह गिनने की 
बस चले जा रहे हैं इक दूजे का संबल बने
जीवन सफ़र में.......
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बुधवार, 23 अप्रैल 2014

तृषिता (दुर्मिल सवैया)

    


चुपके-चुपके मुखड़ा ढक के कल रात सखी घर से निकली , 

गरजे बदरा धड़का जियरा दमकी घन बीच मुई बिजली||
उतरी नभ से जग के डर से लहकी-लहकी फिरती तितली,
जल बीच रही तृषिता मछली तड़पी रतिया सगरी इकली|


मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

उन्मत्त परिन्दा (अतुकांत )

तोड़ नीड़ की परिधि
लांघ कर सीमाएं
भुला  नीति रीति
सारी वर्जनाएं
छोड़ संयम की कतार
दे परवाज़ को विस्तार
वशीकरण में बंधा
लिए एक अनूठी चाह
कर बैठा गुनाह
लिया परीरू चांदनी का चुम्बन
जला बैठा अपने पर
उसकी शीतल पावक चिंगारी से
गिरा औंधें मुहँ
नीचे नागफनी ने डसा
खो दिया परित्राण
ना धरा का रहा
ना गगन का
बन बैठा त्रिशंकु
वो उन्मत्त परिंदा
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मंगलवार, 18 मार्च 2014

होली के बाद

होली खेल कर थका मांदा
अधखुली पलकों से पलंग पर लेटा था
उसका सर मेरी पेशानी पर झुका था
उसकी सुनहरी लटें चेहरे पर
गुदगुदी पैदा कर रही थी
 उसने अधरों की कोमल पंखुड़ियों
से मेरे गाल को स्पर्श किया
तो उस वक़्त मैं खुद को
दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान
समझ रहा था  
अचानक दो गर्म बूंदे मेरे मुख पर पड़ी
उसे आज जुकाम था
 अचानक उसने अपने दो दांत
मेरे गाल पर गड़ा दिए
मैं चीखा तो वो हँसने लगी
मैंने लपक कर उसे बाँहों में
भर लिया तो पूरा गीला हो गया
फिर मैं  जोर से बोला

अजी सुनती हो इसका डाइपर बदल दो 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

होली की शुभकामनायें

होली में मत भूलिये ,आँखें हैं अनमोल|
इक दूजे पर डालिये ,पुष्प रंग के घोल||
पुष्प रंग के घोल ,मलें खुश हों हमजोली|
             रहे जोश में होश ,वही है सच्ची होली||


देखो आये साथियों,होली के हुडदंग|
दरवाजे पर बज रहे,ढ़ोला फाग  मृदंग||  
ढ़ोला फाग  मृदंग, नशेडी नचते आये| 
झूमे पीकर भंग ,संग गर्दभ भी लाये||
              फेंको फेंको रंग , भरी कुण्डलिया  फेंको|                          पकड़ो ब्लोगर आज ,छोड़ मत देना देखो||