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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

जय भारत माता जयहिंद

मेरे देश वासियों दोनों आँखे खुली रखना 
एक आँख संसद पर दूजी सरहद पर रखना !
गिद्ध द्रष्टि देख रही हैअपने घर की हलचल
हर कदम आगे रखना देख जरा संभल कर 
अपना तिरंगा झुक न पाए इसे संभाले रखना 
एक आँख संसद पर दूजी सरहद पर रखना !

सर्द हिमखंड पिघल रहे हैं देखो धरा की आग से 
जंगल भी थर्रा रहे हैं अब सिंघों की जाग से 
एक जुट है सारा वतन नजर लक्ष्य पर रखना 

एक आँख संसद पर दूजी सरहद पर रखना !

बचा कर रखना अपना ईमान वोट के खरीदारों से 
कर लो दो -दो हाथ इन सत्ता के ठेकेदारों से 
कर दो विभूषित देश की कुर्सी नेक नियत दारों से 
तुम से ही है देश का गौरव अपना  हक जमा कर रखना
 एक आँख संसद पर दूजी सरहद पर रखना!

भ्रष्टाचार को ख़त्म करना है 
आज खालो ये कसम !
जो भी राह में रोड़ा आये 
उसको करदो वहीँ भसम !
बन जाओ तुम वीर भगत सिंह 
चन्द्र शेखर सा जिगर रखना !

एक आँख संसद पर दूजी सरहद पर रखना!
मेरे देशवासियों दोनों आँखे खुली रखना !! 







  

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

परहित धरम परम सुखदाई

                 

                                                                  (१ )
सुनकर संतों की वाणी 
मैं प्रभु की अभिलाषी हो गई 
पीकर कटु दुखों का गरल 
मैं कितनी मृदुभाषी हो गई !!
(२ )
देख पराई पीर मैं अपनी 
नाव का चप्पू छोड़ गई 
नजर थी जिसकी तुझपर 
उस तूफाँ का रुख मोड़ गई!! 
(३)
मैं ,मेरा ,अहम् सब छोड़ा 
एक प्रभु से नाता जोड़ा 
अहम् सदा विवेक को हरता 
परहित धरम संतुष्टि करता !!
(४) 
परहित सम धरम नहीं कोई 
तुम भी समझ जाओगे 
पौंछ के देखो अश्रु किसी के 
प्रभु को निकट पाओगे !!
(५ )
एक दिन खोजूंगी उसको 
यह प्रभु की इच्छा पूर्ण हुई 
पाकर अपने  ही दिल में 
जीवन गाथा सम्पूर्ण हुई !!

रविवार, 1 जनवरी 2012

नव वर्ष में मासूम का संकल्प


वसुंधरा अपनी चिर परिचित गति से घूम रही है, 

निशानाथ परदेश भ्रमण की तैयारी में है, 
सखी निशा भी धीरे- धीरे सितारों को अपने आँचल में भर रही है! 
अन्तरिक्ष का केनवास स्पष्ट हो गया है, 
नन्हा चित्रकार मस्तिष्क जाग रहा है! 
क्यूँ न आज इस केनवास पर माँ का चित्र बनाऊं 
तू कितनी प्यारी है माँ ,ये दुनिया को दिखलाऊं ! 
नारियल के वृक्षों को जोड़कर लंबी सीढ़ी बनाई 
और अम्बर तक पहुचाई ! 
छुट मुट घनों के टुकड़ों को नन्हे हाथों से एक तरफ हटाया,
पर्वतों के गर्भ से खींच कर पेन्सिल निकाली 
और माँ का सलोना चेहरा बनाया!
फिर फल फूलों से कुछ इन्द्रधनुष से रंग लेकर , 
पास में ही रखे हुए चांदी के थाल में एकत्र  किये!
थोडा सा झुककर बंगाल की खाड़ी  के  
सागर में अंजली डुबोकर जल लिया और रंग तैयार किये! 
काश्मीर की  घाटी से चिनार के पत्तों से ब्रुश बनाया 
माँ के चेहरे को रंगों से सजाया !
कोयल से थोड़ा काला रंग लेकर माँ की आँखों में काजल लगाया !
रवि की पहली किरण ने माँ के माथे पर बिंदी लगा दी !
तितलियों ने अपने पंखों की हवा से गीला रंग सुखाया !
तस्वीर पूर्ण हुई !
निहारते हुए वह बोला "देखो कितनी सुन्दर थी मेरी माँ "
जैसे ही उसने यह कहा किसी ने उसकी सीढ़ी जोर से खींच ली, 
ओर वो धम्म से नीचे आ गिरा!                                                     
कानो में आवाज आई हरामखोर सपने ही देखता रहेगा 
काम पर नहीं जाना है क्या ?
आँखों में दर्द के बादल, पर उसके हर्दय में 
नए साल के नए शुभ प्रभात में 
एक संकल्प की ज्योति जल चुकी थी 
इस सपने पर सिर्फ मेरा हक है !
मैं यह कर दिखाऊंगा 
हकीकत की सीढ़ी से 
सफलता का ध्वज आसमां पर फहराऊंगा 
अपना भविष्य खुद बनाऊंगा !!!


कहते हैं स्वप्न सिर्फ पलकों  में सोते हैं 
पर होंसले बुलंद हो तो स्वप्न पूर्ण होते हैं !
नव वर्ष की सभी मित्रों को शुभकामनाएं  

  
  
    

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

कुछ कड़वी क्षणिकाएं



गैरों पे शक करता रहा 
दिल नासमझ निकला 
अपनी जमीं तो खींचने वाला 
कोई अपना ही निकला !

कुछ ऐसी चली गर्म हवा
जिसमे अपनत्व के खंड पिघले 
समझते थे जिन्हें पास 
वो दिल से कोसों दूर निकले !

किसी और से क्या शिकवा 
जीवन में जब अँधेरा होता है 
उजाले में संग चलने  वाला 
साया भी कहाँ होता है !

छुपा के खुद को यादों से 
दर्द में दफ़न कर लिया 
अब ले चलो जनाजा 
हमने तो सफ़र कर लिया !

फंसी हुई थी मैं अपनत्व के जाल में 
हवा के एक ही झोंके ने आजाद कर दिया !




मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

कविता

कल्पना की पराकाष्ठा
अन्तरिक्ष को छू कर आई कविता !
कवियों की नन्ही जान,
शब्दों में मुस्काई कविता !
कभी दोहा, कभी छंद 
कभी ग़ज़ल कभी गीत अनुबंध 
हर रूप में समाई कविता
हिंदी  साहित्य के सागर  में 
डूब के नहाई कविता 
अन्तरिक्ष को छू कर आई कविता !
पञ्च तत्वों की ओढ़ चुनर 
फसलों संग लहराई कविता 
फूल फूल पर कलि कलि पर 
तितली बन इठलाई कविता !
अन्तरिक्ष को छू कर आई कविता !
राजनीति के गलियारों में
 सेंध लगा कर आई कविता 
भ्रष्टाचार के सड़े फूंस  में 
आग लगा कर आई कविता !
अन्तरिक्ष को छू कर आई कविता !
शहीद स्मारक के क़दमों में 
दीप जला कर आई कविता 
देशप्रेम का जयकारा कर 
तिरंगा फहरा कर आई कविता !
अन्तरिक्ष को छू कर आई कविता !!

   

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

मैं मूढ़ मति

 पग- पग पे समझाया उसने 
मैं आगे कदम बढ़ाती रही, 
जिन राहों पर रोका उसने 
मैं उन राहों पर जाती रही !
पतन खड़ा तेरी चौखट पे 
मैं जीत का जश्न मनाती रही, 
गलत है ये टोका उसने 
मैं धूल की तरह उड़ाती रही!
हरसूं मैं तुझको देख रहा 
मैं अट्टाहस कर झुठलाती रही 
औंधे मुंह गिर जाओगी 
मैं खुल के पेंग बढ़ाती रही !
जब खिसक गई पैरों से जमीं
मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही ! 

  

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

पर का बोझ

मेरे ख़्वाबों के परों को आसमाँ मिलता रहा पर,उसको गज भर जमीं  ना मिली !
कितनी सुद्रढ़ है मेरे आशियाने की नीव पर ,  उसको एक पग देहली  ना मिली!
हीरे मणिक,रत्नों से भरा है मेरा पारावार पर, उसको खारी एक बूँद  ना मिली!
सतपक्वानो से भरी है मेरी थाली पर, उसे दो सूखी रोटी  ना मिली !
कितनी गर्म ,नर्म है मेरी रिजाई पर,उसे फटी एक कंबली  ना मिली !
फिर भी कितने सुकून से सोता है वो पर ,मुझे इक पहर भर नींद ना मिली !
और मैं इस पर के बोझ से भरी गठरी को अपनी नाव में रख कर जीवन भर खेती चली गई !!!