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शनिवार, 24 दिसंबर 2011

कुछ कड़वी क्षणिकाएं



गैरों पे शक करता रहा 
दिल नासमझ निकला 
अपनी जमीं तो खींचने वाला 
कोई अपना ही निकला !

कुछ ऐसी चली गर्म हवा
जिसमे अपनत्व के खंड पिघले 
समझते थे जिन्हें पास 
वो दिल से कोसों दूर निकले !

किसी और से क्या शिकवा 
जीवन में जब अँधेरा होता है 
उजाले में संग चलने  वाला 
साया भी कहाँ होता है !

छुपा के खुद को यादों से 
दर्द में दफ़न कर लिया 
अब ले चलो जनाजा 
हमने तो सफ़र कर लिया !

फंसी हुई थी मैं अपनत्व के जाल में 
हवा के एक ही झोंके ने आजाद कर दिया !




बुधवार, 14 दिसंबर 2011

पर का बोझ

मेरे ख़्वाबों के परों को आसमाँ मिलता रहा पर,उसको गज भर जमीं  ना मिली !
कितनी सुद्रढ़ है मेरे आशियाने की नीव पर ,  उसको एक पग देहली  ना मिली!
हीरे मणिक,रत्नों से भरा है मेरा पारावार पर, उसको खारी एक बूँद  ना मिली!
सतपक्वानो से भरी है मेरी थाली पर, उसे दो सूखी रोटी  ना मिली !
कितनी गर्म ,नर्म है मेरी रिजाई पर,उसे फटी एक कंबली  ना मिली !
फिर भी कितने सुकून से सोता है वो पर ,मुझे इक पहर भर नींद ना मिली !
और मैं इस पर के बोझ से भरी गठरी को अपनी नाव में रख कर जीवन भर खेती चली गई !!!     

शनिवार, 17 सितंबर 2011

दो शाएरी



सोचा था आज तो कुछ कहेंगे लब
पर धडकनों के शोर में 
फिर से शब्द खामोश हो गए !!

शायद लटकाया था जमीं पर जानबूझ कर
 आँचल उसने 

जब तक हम उठाते वो दूर चले गए !