गैरों पे शक करता रहा
दिल नासमझ निकला
अपनी जमीं तो खींचने वाला
कोई अपना ही निकला !
कुछ ऐसी चली गर्म हवा
जिसमे अपनत्व के खंड पिघले
समझते थे जिन्हें पास
वो दिल से कोसों दूर निकले !
किसी और से क्या शिकवा
जीवन में जब अँधेरा होता है
उजाले में संग चलने वाला
साया भी कहाँ होता है !
छुपा के खुद को यादों से
दर्द में दफ़न कर लिया
अब ले चलो जनाजा
हमने तो सफ़र कर लिया !
फंसी हुई थी मैं अपनत्व के जाल में
हवा के एक ही झोंके ने आजाद कर दिया !