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रविवार, 24 अप्रैल 2011

shayeri

चाक जिगर सिलना है तो इस तरह से सिल 
कि कभी पुराने जख्मों को धागे का कोई छोर ना मिले !!

अब हमे तन्हाइयों से डर नहीं लगता 
खंडरों में रहकर हम पत्थरों कि जुबां समझने लगे !! 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

फर्क बस इतना है


तुमने इकरार किया पलकें झुकाकर 
हमने इजहार किया नजरें मिलाकार!
तुम ज़माने से कुछ कह नहीं सकते 
हम मगर चुप रह नहीं सकते !
तुम दर्द को  घूँट घूँट पी जाते हो 
हम एक पल सह नहीं सकते !
तुम ख़्वाबों में जी लेते हो 
हम तुम बिन जी नहीं सकते !
फर्क बस इतना है !!

रविवार, 10 अप्रैल 2011

शाएरी


न जाने कोन से दर्द का बादल है उनकी आँखों में
कि हमे अब अपना अक्स दिखाई नहीं देता !!

कितनी दूरियां बढ़ गई इस तन्हाई में 
अब ढूँढ़ते हैं उन्हें हम अपनी ही परछाई में !!

मंगलवार, 15 मार्च 2011

शाएरी

घरोंदे बना -बना  कर मिटाते रहे
ख़त लिख-लिख कर जलाते रहे 
जाने क्या बैर था हमें अपने दिल से 
ओरो के लिए जिसको दुखाते रहे !!