तिल-तिल जलती रही विभावरी
लावा द्रगों से बहता रहा,
बदन को नोचती रही मजबूरियां
चिन्दा चिन्दा कलेजा फटता रहा !
शुष्क हुआ क्षीर का सोता,
भूख से शिशु रोता रहा!
मरता रहा कोख में स्त्रीत्व,
पुरुषत्व दंभ भरता रहा !
लुटती रही अस्मतें,
विधाता मूक दर्शक बनता रहा!
गरीबी चीरहरण करती रही,
दूर खड़ा जमाना हंसता रहा !