हरित तरु अरु प्रकृति न्यारी |व्याधि निवारक आपद हारी ||
गर्भस्थ शिशु सम जीव विस्तारी |करे सुपोषण ज्यों महतारी ||
वन,उपवन,गिरी वय संचारी |होई है अधम जो चलावै आरी ||
कुपित प्रकृति रूप जेहि धारे |ताहि कहौ फिरि कौन उबारे ||
स्नेह जल सींचि-सींचि तरु बोई |प्राण सफल आनंद फल होई ||
जबहिं कठिन परिश्रम कीजै |तबहिं सम- सरस फल लीजै ||
सुपर्यावरण में ज्योति तुम्हारी |इदं उक्तिम ग्रहेयु नर नारी ||
