पहाड़ जैसी जिंदगी वो चार दिनों में जी गया
हम दो घूँट पी न सके वो सारा समुंदर पी गया !
वो उन राहों पर दौड़ गया जिन राहों पर हम चल न सके ,
जाते हुए सब को बोल गया की हम आँख में आंसू भर न सके
वो व्यथित ,धहकते सीनों में कुर्बानी के अंकुर बो गया
हम देखते ही रह गए वो तिरंगा ओढ़ कर सो गया !
शोलों से भरा जज्बा पाषाण सा जिगर रखता था
हम बोने बन कर रह गए वो जाते हुए आसमा छू गया !!