· कल की वो शाम
जब हम हाथों में हाथ लेकर
बैठे थे उस शिला खंड पर
सामने झेलम नदी अपने
पूर्ण उफान के साथ उन्मादित
पत्थरों को छलान्गती
बलखाती ,गुनगुनाती बह रही थी अपने
तीव्र प्रवाह के साथ
कल्पनाओं में मानो कोई
अल्हड योवना भाग रही है
अपनी प्रीत को बांहों में जकड़ने
एतिहासिक और भोगोलिक
कथन में जा रही है पडोसी
देश पाकिस्तान में
उसे कोई सरहद कोई
सीमा रोक नहीं सकती
हम यह मनमोहक द्रश्य
निगाहों में समाते जा रहे थे
जुबान खामोश थी पर दिल की धड़कने
स्मृति पटल पर अपनी कहानी
लिख रही थी इस सलोने
वक़्त को दिल की तिजोरी में बंद
कर रही थी
मेघो ने भी अपनी
नन्ही नन्ही बूंदों से अपनी
ख़ुशी का इजहार किया
पास में जलाई हुई लकड़ियों ने
मानो मेघों से कुछ कहा
और वर्षा रुक गई
हाथो में गिलास रुत को
और मादक और तिलस्मी बना
रहे थे मानो जंगल में
खुश होकर मयूर नृत्य
कर रहे हों
ऐसे मन म्रदंग
बज रहे थे धीमे धीमे
और झेलम साथ में अपना सुर मिला रही थी
वो वक़्त तो कहने को क्षणिक था
पर हम दोनों के दिलों
में हमेशा के लिए घर बना चुका था
वो जंगल में मंगल
था या कोई दिवा स्वप्न
जहां से हम एक दूजे का हाथ थामे लौट रहे थे !
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