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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

धूप का टुकड़ा (ग़ज़ल )


  
  सपना गरीब का रब  टूटा बिखर गया
ज़ालिम जो मुश्किलात में वापस मुकर गया
    शब्दों के तीर छोड़ वो जैसे उधर गया
       आँखों में गर्म खून का लावा उतर गया
             कुर्सी के ख़्वाब हर इक  की आँख में मिले
      जैसे किसी जुनून का साया पसर गया
              उसको ख़ुशी की छाँव में धोखे मिले फ़कत
           तपकर दुखो की आंच में कुछ तो निखर गया
            आकाश  ख्वाहिशों का तभी छूने थी चली
       सैंयाद कैंचियों से सभी पर कतर गया
        खुशियाँ दरों पे आकर ऐसे सिमट गई
         हाथों से ज्यूँ शराब का प्याला बिखर गया
               फ़ज्लो करम की सख्त  फ़जीहत तो देखिये
         उसके फ़लक से धूप का टुकड़ा गुजर गया
        इंसान जिंदगी भर समझा जानता
            आया था किस दिशा से  जाने किधर गया
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राजेश कुमारीराज”

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

क्यों तुम ऐसे मौन खड़े ?



 मेरे प्रांगण के राजा

क्यों  तुम ऐसे मौन खड़े 

झंझावत जो सह जाते थे 

जीवन के वो बड़े बड़े 

क्यों तुम ऐसे मौन खड़े ?

बरसों से जो दो परिंदे 

इस कोटर  में रहते थे 

दर्द अगर उनको  होता 

तेरे ही  अश्रु बहते थे 

उड़ गए वो तुझे छोड़ कर 

अपनी धुन पर अड़े अड़े

क्यों  तुम ऐसे मौन खड़े ?

इस जीवन की रीत यही है 

सुर बिना संगीत यही है  

उनको इक दिन जाना था 

जीवन  धर्म निभाना था 

राजा जनक भी खड़े रह गए 

आँसू नयन से झड़े झड़े 

क्यों तुम ऐसे मौन खड़े ?

इकला ही है आना- जाना 

चंद दिनों का है ठिकाना 
जीवन के इस रंग मंच पर 

आकर बस किरदार निभाना 

कुम्भकार की माटी जैसे 

बनते मिटते सभी घड़े 

क्यों तुम ऐसे मौन खड़े ? 
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

अनसुलझी पहेली (लघु कथा )


रोज की तरह मंदिर के सामने वाले पीपल के पेड़ की छाँव में स्कूल से आते हुए कई बच्चे सुस्ताने से ज्यादा उस बूढ़े की कहानी सुनने के लिए उत्सुक  आज भी उस बूढ़े के इर्द गिर्द बैठ गए और बोले दादाजी दादा जी आज भूत की कहानी नहीं सुनाओगे ?नहीं आज मैं तुम्हें इंसानों की कहानी सुनाऊंगा बूढ़े ने कहा-"वो देखो उस घर के ऊपर जो कौवे मंडरा रहे हैं आज वहां किसी का श्राद्ध मनाया  जा रहा है, उस लाचार बूढ़े का जो पैरों से चल नहीं सकता था पिछले वर्ष उसकी खटिया जलने से मौत हुई थी उसकी खाट के पास उसकी बहू ने  एक छोटी सी स्टूल पर भगवान् की फोटो रखी और कुछ अगर बत्तियां | सोते हुए बूढ़े के हाथ में माचिस और एक अगर बत्ती पकड़ा दी और उसके बिछौने के चारो कोनों में आग लगा कर दरवाजा भिड़ा कर चली गई सुबह आग की लपटों को देख आस पास के लोगों ने बूढ़े को अधजला मृत पाया और बात फ़ैल गई कि पूजा करते हुए बिस्तर में चिंगारी लग गई और ये हादसा हो गया | जीते जी तो इंसानों की कद्र नहीं करते और मरने के बाद देखो कैसा जश्न मना रहे हैं और देखो जो  आज भोजन की थाली में हलुआ रखा है  ना उस हलुए के लिए मैं  हमेशा तरसता- तरसता चला गया | बच्चों ने , जो अभी तक कौवों को ही देख रहे थे यह सुनते ही अचानक जो पलट कर देखा वो बूढा दादा जी गायब था और बच्चे अनसुलझी पहेली को सुलझाने में लगे थे |   
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सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

आओ आओ घोटाला करें (हास्य व्यंग्य )

आओ आओ घोटाला करें 

कोयले सा मुंह काला करें 
             हमसे  है छोटी  जमीन                                

आसमान  भी नहीं बड़ा 

कौन हमको  छू पायेगा 
हम जो निश्चिन्त हैं वहां 
आओ हम मिल बैठ बाँट करें 
कोई तो काण्ड हवाला करें 
आओ आओ घोटाला करें 
हाथ जोड़ें   वोट पायें 
पाँव पकड़ें वोट पायें  
कुर्सी जब मिल जायेगी
जनता शीश झुकाएगी 
जनता धन  स्विस बैंकों में भरे  

क्यूँ काम  मेहनत वाला करें 

आओ आओ घोटाला करें 
जनता को दें छह सिलेंडर 
खुद रख लें सौ सिलेंडर 
इसका माल उसके अन्दर 
उसका माल अपने अन्दर 
हम क्यूँ अब किसीकी  फ़िक्र करें 
वो कर लें जो  कंटाला करें 

आओ आओ घोटाला करें 

कभी स्टाम्प पेपर  बदल  
कभी पशु  चारा खाकर 
कभी शहीदों के कफ़न 
बोफोर्स तोप के जैसा  
आओ फिर  नया अनुबंध करें 
और कोई गड़बड़ झाला करें 
आओ आओ घोटाला करें 
अब तक कर सकी जनता 

चुनाव में क्या कर लेगी 

हम सा बेशरम  कोई 
नैतिकता  क्या कर लेगी  
नोट देख वोटर की लार झरे  
बाकी काम मद्य हाला करें 
आओ आओ घोटाला करें 
आओ आओ घोटाला करें 
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