you are welcome on this blog.you will read i kavitaayen written by me,or my creation.my thoughts about the bitterness of day to day social crimes,bad treditions .
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बुधवार, 28 जुलाई 2010
शनिवार, 17 जुलाई 2010
सोमवार, 12 जुलाई 2010
मानव जीवन आख्याति
दुनिया में आया तो जननी प्यारी मिली
वात्सल्यता की देवी जीवन संचारी मिली !
बालावस्था में खेल खिलोने ,
पुस्तक ओर मित्रों की यारी मिली !
किशोरावस्था में भ्रमित ,जिज्ञासु मन
और प्रश्नों की श्रंखला विस्मयकारी मिली !
युवावस्था में दिल की रंगत न्यारी मिली
ग्रहस्ती की जिम्मेदारी मिली !
प्रौढ़ावस्था में कुछ परिपक्व अनुभव ,
कुछ संचयन आबंटन की हकदारी मिली !
वृद्धावस्था में कुछ व्याधि
कुछ लाचारी मिली !
अंतिम चरण में मौत जीवन पे भारी मिली
कुल इन चरणों में मानव जीवन आख्याति सारी मिली !!
वात्सल्यता की देवी जीवन संचारी मिली !
बालावस्था में खेल खिलोने ,
पुस्तक ओर मित्रों की यारी मिली !
किशोरावस्था में भ्रमित ,जिज्ञासु मन
और प्रश्नों की श्रंखला विस्मयकारी मिली !
युवावस्था में दिल की रंगत न्यारी मिली
ग्रहस्ती की जिम्मेदारी मिली !
प्रौढ़ावस्था में कुछ परिपक्व अनुभव ,
कुछ संचयन आबंटन की हकदारी मिली !
वृद्धावस्था में कुछ व्याधि
कुछ लाचारी मिली !
अंतिम चरण में मौत जीवन पे भारी मिली
कुल इन चरणों में मानव जीवन आख्याति सारी मिली !!
शनिवार, 10 जुलाई 2010
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
बुधवार, 30 जून 2010
इस प्यार को क्या नाम दें
No one can snatch or beg love.it is a mystery of your heart you have to unfold it.true love leave such impression on your heart ,that one can pass whole life in it's shadow.there is a truthness behind this poetry....feel it........
स्मृति के पार तक विस्तृत तुम्हारी याद लो फिर चली आई
बरसती हुई पलकों मैं डूबी वो शाम लो फिर चली आई
जड़वत आँखों में आज फिर नमी सी है
शून्य सम जीवन में फिर क्यूँ कमी सी है
फाड़ दिया है पन्ना आज का किसी ने कैलेंडर से
क्या फाड़ पायेगा जो लिखा मेरे मस्तिष्क पटल से
आज फिर वोही दिन है मेरे जीवन में आये तुम बहार लेकर
और आज ही के दिन चले गए उजाड़ देकर
ख़ुशी मनाऊँ या मातम सोचते ही सोचते ,पच्चीस बरस बीत गए
मेरा प्रभात बन कर तुम नित आती हो
जब मेरे सिरहाने रखी तस्वीर में खिलखिलाती हो
कोन कहता है मैं उदास रहता हूँ ,मैं भी हँसता हूँ
जब तुम सामने अलमारी में रखे फ्रेम में जड़े हुए
अपने कुरते के बटन और चूडिया बजाती हो
मैं प्यासा कहाँ हूँ ,मेरे अधरों की प्यास यूँही बुझ जाती है
जब मेरी नजर कोने में रखे हुए उस कप पर
जिसमे तुम चाय पिया करती थी ,बरबस ही चली जाती है
देखो तुम हँसना नहीं एक राज खोल रहा हूँ मैं ,
तुमने जो अपने हाथों से बुना था सबसे छुपा कर मैंने तकिए में रखा था
आज जून के महीने में वो स्वेटर पहन रहा हूँ मैं
लोग कहीं पागल न कहे सर्दी का बहाना बना रहा हूँ मैं
कुछ दिनों से बिस्टर पर पड़ा हूँ मैं
डॉक्टर कहते हैं कुछ दिन ही शेष बचे हैं
एक एक कर गिन रहा हूँ मैं
बस अब वो दिन आने वाला है ,पच्चीस बरस का इन्तजार ख़त्म होने वाला है
अब तुम भी मुस्कुरा दो तुम्हारी तस्वीर के सामने दीप जलाने का वक़्त होने वाला है !
स्मृति के पार तक विस्तृत तुम्हारी याद लो फिर चली आई
बरसती हुई पलकों मैं डूबी वो शाम लो फिर चली आई
जड़वत आँखों में आज फिर नमी सी है
शून्य सम जीवन में फिर क्यूँ कमी सी है
फाड़ दिया है पन्ना आज का किसी ने कैलेंडर से
क्या फाड़ पायेगा जो लिखा मेरे मस्तिष्क पटल से
आज फिर वोही दिन है मेरे जीवन में आये तुम बहार लेकर
और आज ही के दिन चले गए उजाड़ देकर
ख़ुशी मनाऊँ या मातम सोचते ही सोचते ,पच्चीस बरस बीत गए
मेरा प्रभात बन कर तुम नित आती हो
जब मेरे सिरहाने रखी तस्वीर में खिलखिलाती हो
कोन कहता है मैं उदास रहता हूँ ,मैं भी हँसता हूँ
जब तुम सामने अलमारी में रखे फ्रेम में जड़े हुए
अपने कुरते के बटन और चूडिया बजाती हो
मैं प्यासा कहाँ हूँ ,मेरे अधरों की प्यास यूँही बुझ जाती है
जब मेरी नजर कोने में रखे हुए उस कप पर
जिसमे तुम चाय पिया करती थी ,बरबस ही चली जाती है
देखो तुम हँसना नहीं एक राज खोल रहा हूँ मैं ,
तुमने जो अपने हाथों से बुना था सबसे छुपा कर मैंने तकिए में रखा था
आज जून के महीने में वो स्वेटर पहन रहा हूँ मैं
लोग कहीं पागल न कहे सर्दी का बहाना बना रहा हूँ मैं
कुछ दिनों से बिस्टर पर पड़ा हूँ मैं
डॉक्टर कहते हैं कुछ दिन ही शेष बचे हैं
एक एक कर गिन रहा हूँ मैं
बस अब वो दिन आने वाला है ,पच्चीस बरस का इन्तजार ख़त्म होने वाला है
अब तुम भी मुस्कुरा दो तुम्हारी तस्वीर के सामने दीप जलाने का वक़्त होने वाला है !
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