यह ब्लॉग खोजें

रविवार, 23 मई 2010

मानसून

मानसून की पहली बारिश
प्रकर्ति ने सर झुका लिया
बूँद जो उतरी धरा की और
जलज ने आँचल फैला दिया .
मानसून

शनिवार, 22 मई 2010

orkut - Promote

orkut - Promote

मुझको दुनिया में आने दो

मैं  तेरी  धरा का बीज हूँ माँ
मुझको पौधा बन जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
मुझको दुनिया में आने दो
.        
      मैं तेरे मातृत्व का सन्मान    
      नहीं कोई शगल का परिणाम
      मेरा अस्तित्व तेरा दर्प है
      मुझमे निहित सारा संसार .


गहन तरु की छाया में 
लघु अंकुर को पनपने दो  
      नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
      मुझको दुनिया में आने दो .


जंगल उपवन खलियानों में
हर नस्ल के पुहुप महकते हैं
स्वछंद परिंदों के नीड़ो में
दोनों ही लिंग चहकते हैं .
      प्रकर्ति के इस समन्वय का
      उच्छेदन मत हो जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे एसा
मुझको दुनिया में आने दो .      


                     समाज की घ्रणित चालों से माँ
                     तुझको ही लड़ना होगा
                      नारी अस्तित्व के कंटक का
                     मूलोच्छेदन करना होगा .
 तेरे ढूध पर  मेरा भी हक है
दुनिया को ये समझाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
मुझको दुनिया में आने दो ..    




मुझको दुनिया में आने दो