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सोमवार, 9 सितंबर 2013

थैंक्स !!!

कर्ण पट  चीरता हुआ  संगीत
रक्तचाप बढाता  हुआ शोर
आँखों की पुतलियों पर
 कहर ढाती रौशनी
नथुनों पर हावी होती मय की गंध
संस्कारों पर आघात करते
लडखडाते क़दमों से
 कालीन पर थिरकते
रंगे पुते चेहरे ओढ़े 
अध् नंगे जिस्म
छनछनाते हुए कट गिलास
 कहकहा लगाकर
कुछ कागजों पर
हस्ताक्षर करते  
एक दूजे से हाथ मिलाते
कुटिल मुस्कान के साथ
कुछ उपहारों का आदान प्रदान करते लोग
फिर अचानक एक
दूर कौने में एक कप सूप
और एक रोटी के लिए इन्तजार करते
हुए मूर्ती वत बैठे मेरी और
आकर मुझे बधाई देते
और याद दिलाते कि
मैं अस्सी बरस का हो गया हूँ
और मैं अपने भविष्य
की जुल्मत में  बेकल
आगे  बचे सफ़र की
  लकीर को हथेली से
अपने  नाखून से
खुरचने लगता
और रंगमच के
असफल चरित्र निर्माता
सा  नेपथ्य में
अपनी गल्तियों को टटोलता  
हुआ  अनमना
                           सा कहता थैंक्स !!!

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

ऐ जान जरा बात बताओ तो सही

दीवार तग़ाफुल  की  ये ढाओ  तो सही
इक बाँध रिफ़ाकत का बनाओ तो सही

आ पाक मुहब्बत में मिटा दें सरहदें
  इस ओर  जरा हाथ बढ़ाओ  तो सही 

हैरान परेशान खड़े हो इस कदर 
ऐ- जान जरा बात बताओ तो सही 

मैं पार तेरे नाम से कर जाऊं तपिश 
सैलाब- ए- अंगार बहाओ तो सही

वीरान निगाहों  में तेरी लिख दूँ ग़ज़ल
अशआर  गुरेज़त  के सुनाओ तो सही

तामीर करूँ ताज़महल तेरे लिए
इक नींव तकारुब की बिछाओ तो सही

मैं राज़  छुपा  दिल में ही रख लूँगी सदा
पर्दा –ए- हकीक़त को  उठाओ तो सही

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तगाफ़ुल  =उपेक्षा 
रिफ़ाकत= दोस्ती.
गुरेज़त= विरक्ति
तकारुब= समीपता
तामीर =निर्माण

रविवार, 1 सितंबर 2013

कटु सच्चाई (छंद मुक्तक)

खूँटी पर लटका दिया ,भीतर नहीं प्रकाश 
पर मेरे तुम काट कर ,निगल गए आकाश 
आँखों में बरसात है ,मौसम भी है सर्द 
देख गगन को हो रहा ,इन पांखों  में दर्द   

तिल-तिल घिसकर गात,जो सप्त  वाहन ठेला
जल बिन औ  बिन वात,वो निपट खड़ा अकेला
खुशियों की नहीं हाट ,दर्द भरा यहाँ  मेला 
क्यों होता हैरान, यही जीवन का  खेला  


हुआ कहाँ कब बेसुरा ,रिश्तों का संगीत। 
उठते-उठते कब उठी , भीतर- भीतर भीत ॥  
झूठे हैं रिश्ते यहाँ ,झूठी दिल की प्रीत| 

हे मानव समझा रही ,कलयुग की ये रीत ||