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मंगलवार, 14 मई 2013

मैं कैसे सोऊँ ??

मैं  कैसे सोऊँ ??
नौ माह का अंकुर पूर्ण हुआ 
 व्याकुल जग पंथ निहारता 
जब गर्भ नाल में  हुई पीड़ा  
रक्त माँ- माँ कह पुकारता 
मैं कैसे सोऊँ ?
जब  बिस्तर उसका हुआ गीला 
वो करवट करवट जागता 
मुख ,उँगलियाँ मचलती वक्ष पर 
पय उदधि हिलौरे मारता 
मैं कैसे सोऊँ ?
मैं रोटी का कौर लिए फिरती 
वो नाक चढ़ा चिंघाड़ता 
मैं  कलम किताब दूँ हाथों में  
वो आगे- आगे भागता 
मैं कैसे सोऊँ ?
जब देर सवेर घर में आता 
शंकित मन फन फुफकारता 
वो प्रश्न का उत्तर ना देकर 
 निष्पंद शून्य में ताकता 
मैं कैसे सोऊँ ?
मैं रात दिन उसकी राह तकूँ 
मन उसकी खबर  सिहारता 
 हर वक़्त मुझे है फिकर उसकी 
जब वो सरहद पर जागता 
मैं कैसे सोऊँ ?
जब अंश मेरा हो खतरे  में 
वक़्त खड़ा धिक्कारता 
होकर जख्मी ज्यों अरण्य सिंह  
अस्तित्व मेरा हुंकारता 
मैं  कैसे सोऊँ ??
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सोमवार, 6 मई 2013

(घनाक्षरी) प्रज्ञा पुंज


(घनाक्षरी)  प्रज्ञा  पुंज(1)
हिंदी भाषा के शिंगार  रस छंद अलंकार 
नव शब्द माल लेके गीत तो बनाइए 
 संधि प्रत्यय समास, हों मुहावरे भी ख़ास  
भाव रंगों  में डुबो के कविता  रचाइए 
गीत या निबन्ध हो नवल भाव  सुगंध हो 
साहित्य सरोवर में डुबकी  लगाइए 
विद्या वरदान मिले लेखनी को मान मिले 
अपनी राष्ट्र भाषा का मान तो बढाइए 
 (2) 
भाव गहन बढे जो ध्यान नदिया चढ़े जो 
लेखनी की नाव लेके पार कर जाइये 
ह्रदय में प्रकाश हो मुट्ठी भरा आकाश हो  
प्रज्ञा  पुंज अर्णव से  अलख जगाइये 
हो छंदों की बरसात भीगे मन पात- पात 
ज्ञान अमृत  बूँदे  पीके  प्यास बुझाइये 
नित  जिसकी छाँव हो असीमित प्रभाव हो    
 ऐसा  विद्या कल्पतरु घर  में उगाइए
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गुरुवार, 2 मई 2013

छत्तीस वर्ष की गुलाबी गोटे दार चुनरिया (शादी की छत्तीस्वी साल गिरह )



   
                                  दोस्तों के भेजे गए फूलों से दिन का शुभारम्भ  
फिर लहराई 
सुभागी ,गुलाबी 
गोटेदार चुनरिया 
जिसका सितारों भरा आसमाँ 
प्रत्यक्षदर्शी है उन 
अविस्मरणीय लम्हों का 
जिसके एक छोर में 
किया गया था गठबंधन 
प्रियतम की पीली चादर 
के छोर से ,
उस छोर की सिलवटें 
जस की तस 
आज भी उन पलों को जीती हैं 
एक सितारा भी नहीं गिरने दिया 
इस अम्बर से मैंने 
क्यों की मैं जानती हूँ 
आपने अपना आशीर्वाद भी  टाँक रखा है 
हर सितारे के साथ माँ 
कितने मौसम बदले रुत बदली 
किन्तु इसकी आभा में 
कोई भी तो कमी नहीं आई 
वही कोमलता 
वही मखमली एहसास हुआ 
जब आज फिर स्पर्श किया 
आज छत्तीस वर्ष की हो गई है 
ये चुनरिया ,मम्मी पापा 
आपको याद है ना !!!
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