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मंगलवार, 8 मई 2012

कुछ खरी-खरी त्रिवेणियाँ


कुछ खरी-खरी त्रिवेणियाँ
(१)
घर के बीच खिंच रही दीवार 
बुजुर्गों के दिलों में पड़ी दरार  
कैसा दर्दनाक मंजर है किसे देखूं |


(२)
तेरे इस गूंगे घर से तो 
खंडहर  ही बेहतर हैं 
वहां कम से कम पत्थर तो बाते करते हैं |
 (३)
तुम लाये हो इक बवंडर छिपा के अपने सीने में 
एक बार तो ये सोचा होता 
ताश के पत्तों से बना है मेरा घर|
(४)
बड़ी हसरतों से जमा किये थे शबनम के मोती 
स्वर्ण रथ पर आया लुटेरा 
सब चुरा के ले गया |
(५)
मेरे अपने ही फूलों ने 
झुका दिया इस डाली को 
वर्ना मेरी गर्दन ने कभी झुकना नहीं सीखा |
(६)
खुद को जलाकर जग को देते हो उजाला 
फिर भी एक नजर तुझे कोई देखना नहीं चाहता  
कोई तुझसा बेचारा नहीं देखा | 
(७)
ऐ तितली जरा संभल के उड़ना 
घात में बैठे है कांटे फूलों की आड़ में 
चीर देंगे तेरे कोमल पर 
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सोमवार, 7 मई 2012

एक मुलाकात



सुबह सुबह जैसे ही फ़ोन की घंटी बजी उधर से हमारे ब्लोगिंग  शिरोमणि डॉ रूप चन्द्र शास्त्री मयंक जी की आवाज सुनाई दी |नमस्कार शुभप्रभात करने के बाद बातो बातों में पता लगा कि वो देहरादून अपने बेटे के पास आये हैं  अतः मेरे निमंत्रण पर वो अपनी धरम पत्नी श्री मति अमर भारती व् अपनी पुत्रवधू के साथ मेरे निवास स्थान पर मुझसे मिलने आये |उनसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई वो इतने सरल स्वभाव के शख्स हैं कि लग ही नहीं रहा था कि पहली बार मिल रहे हैं धन्य अंतर्जाल ,ब्लोगिंग जो दूर दूर से लोगों को इस तरह मिलवा देता है और एक दूसरे के बीच एक आत्मीयता स्थापित कर देता है| बातचीत के दौरान शास्त्री जी ने मुझे  अपने काव्य रचनाओं की चार पुस्तकें  सुख का सूरज ,धरा के रंग ,नन्हें सुमन
 (बाल कवितायेँ ),हँसता गाता बचपन (बाल कवितायेँ )सप्रेम भेंट की|
और हाँ उन्होंने एक दिन चर्चामंच पर मंगलवार की चर्चा  लगाने की पेशकश  भी की जो मैंने अपना सौभाग्य समझकर सहर्ष स्वीकार  कर ली  और इस तरह अपने ब्लोगेर्स मित्रों की सेवा का अवसर मुझे भी प्रदान  किया गया |इसके लिए मैं हार्दिक आभारी हूँ |चलिए  अब से मैं आप लोगों से हर मंगल वार चर्चा मंच पर मिलूंगी | इस तरह ये छोटी सी मुलाकात आप लोगों से सांझा की शायद आप लोगों को पसंद आई होगी |
धन्यवाद ,आपका दिन मंगलमय हो 

शुक्रवार, 4 मई 2012

आज की नारी


मैं स्वछन्द ,नीर की बदरी हूँ जहां चाहे बरस जाऊँगी
मैं कोई धागा तो नहीं कि सुई के पीछे -पीछे आऊँगी|
मैं मस्त पवन कि खुशबू हूँ जहां चाहे बिखर जाऊँगी 
मैं कोई काजल तो नहीं कि पलकों में सिमट जाऊँगी |
मैं उन्मुक्त सशक्त पतंग हूँ उच्च गगन में लहराऊँगी 
मैं  कोई    मैना तो नहीं कि पिंजरे में कैद हो जाऊँगी| 
मैं पाषाण हिय कि नारी हूँ अपनी क्षमता  दिखलाऊंगी   
मैं कोई शुष्क  लकड़ी तो नहीं कि आरी से कट जाऊँगी|
मैं आज की शिक्षित नारी हूँ कभी शीश नहीं झुकाउँगी
नारी अबला होती है  मैं यह प्रचलित कथन मिटाऊँगी|

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गुरुवार, 3 मई 2012

                                   3 मई 2012  
                        हमारी शादी की पेंतीस्वी वर्षगाँठ  
                  बाहों में बाहें थाम प्रिये हम कितनी दूर निकल आये 

मंगलवार, 1 मई 2012

मजदूर (ग़ज़ल ) १ मई २०१२


मजदूर (ग़ज़ल ) १ मई २०१२
जवानी में उम्र ओढ़ कर आये हो
क्या उम्मीद छोड़  कर आये हो
कितने खारे हैं तेरी आँख के आंसू
क्या समंदर निचौड़ कर आये हो
नजरों से झलकते दर्द के बादल
क्या तूफां को मोड़ कर आये हो  
कितने अंगार छुपे  तेरे शब्दों में
क्या बारूद से जोड़ कर आये हो 
तेरी पिंडलियाँ क्यूँ तनी हुई
क्या मैराथन दौड़ कर आये हो
तेरी उंगलियाँ  क्यूँ छिली हुई
क्या पाषाण फोड़ कर आये हो
भूखे हैं तीन पेट और तेरे साथ
क्या जंजीर तोड़ कर आये हो