कुछ खरी-खरी त्रिवेणियाँ
(१)
घर के बीच खिंच रही दीवार
बुजुर्गों के दिलों में पड़ी दरार
कैसा दर्दनाक मंजर है किसे देखूं |
(२)
तेरे इस गूंगे घर से तो
खंडहर ही बेहतर हैं
वहां कम से कम पत्थर तो बाते करते हैं |
(३)
तुम लाये हो इक बवंडर छिपा के अपने सीने में
एक बार तो ये सोचा होता
ताश के पत्तों से बना है मेरा घर|
(४)
बड़ी हसरतों से जमा किये थे शबनम के मोती
स्वर्ण रथ पर आया लुटेरा
सब चुरा के ले गया |
(५)
मेरे अपने ही फूलों ने
झुका दिया इस डाली को
वर्ना मेरी गर्दन ने कभी झुकना नहीं सीखा |
(६)
खुद को जलाकर जग को देते हो उजाला
फिर भी एक नजर तुझे कोई देखना नहीं चाहता
कोई तुझसा बेचारा नहीं देखा |
(७)
ऐ तितली जरा संभल के उड़ना
घात में बैठे है कांटे फूलों की आड़ में
चीर देंगे तेरे कोमल पर
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