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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

इन्तजार





बिखरे  हुए हैं गेसू इस इन्तजार में 
आये कोई झोंका  हवा का 
और संवार दे !
ढलका हुआ है आँचल 
नर्म  जमीं के बदन पर   
कि चांदनी भी 
तारों की लड़ियाँ निसार दे |
वो बैठे हैं गिराकर 
पलकों की झालरें 
चल के आये जवां ख़्वाब कोई 
और पहलू में जिंदगी गुजार दे |
ऐ काली घटाओ |
तिल सा काजल उधार दे दो 
जाए कोई मेरे महबूब की 
नजरें उतार दे ||
 *****







शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

तुम्हारी आदत


अभी तक गई नहीं तुम्हारी  आदत 
हर जगह मेरा नाम लिखने की !
वो भी दिन थे 
जब तुम रंग बिरंगी चॉक से 
लिख देते थे मेरा नाम श्यामपट्ट पर 
और उपहास के पात्र बनते थे हमदोनो!
कभी मेरे घर के इर्द गिर्द घूमते हुए 
दीवारों पर 
कभीचुपके से फेंके हुए मेरे आँगन में 
अपने ख़त में ,
 लिख देते थे खून से मेरा नाम !
फिर तुमने उस दिन
 रस्मो रिवाजो की मौजूदगी में 
लिख दिया था मेरा नाम हिना से 
अपनी हथेली पर !
और न जाने कितनी चांदनी रातों में 
लिख देते थे चाँद पर उंगली से मेरा नाम !
देखो आज भी उस पत्थर पर
जिसके नीचे मैं सोई हूँ  
लिख रहे हो रंगहीन आंसुओं से 
मेरा नाम !
तुम कहते हो कि 
तुम्हारे रंग खो गए हैं कहीं!
मेरी गुजारिश है तुमसे 
कि आज से तुम अपने दिल पर 
कोई नया नाम लिखो 
धीरे धीरे खोये रंग भी लौट आयेंगे 
और मेरी रूह को चैन भी  मिल जाएगा !


बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

नेह की वो परिभाषा


तेरे मेरे हिय की वो मूक भाषा 
कलम बद्ध न कर पायेगा कोई 
नेह की वो परिभाषा !
सप्त पदी से से चला वो प्यार का सफ़र 
हमसफ़र जिंदगी का ,हर राह हर डगर 
यूँ ही पूर्ण हो अब शेष,
अविछिन्न अभिलाषा !
तेरे मेरे हिय की वो मूक भाषा !
दिलों को जोड़ता अद्दभुत आकर्षण, 
वो निश्छल ,आसक्त अनुबंध,  
प्रेम का प्रगाढ़ समर्पण
छोड़े न कभी साथ;
चिर अनंत, अन्तः उर की आशा !
तेरे मेरे हिय की वो मूक भाषा !
कलम बद्ध न कर पायेगा कोई
नेह की वो परिभाषा !



शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

आयो रे वसंत

धामक -धूमक कर आयो रे वसंत 
धन्य -धरित्री महकायो रे वसंत!
घूम रहे अलि-अलि झूम रही कलि -कलि  
पुहुप -पुहुप मुस्कायो रे वसंत !
 धामक -धूमक कर आयो रे वसंत!

प्रीत -पीत रंग सजी सरसों की क्यारी 
आल्हा की टंकार छेड़े खेतों का हाली
होलिया की गंध संग लायो रे वसंत 
धामक -धूमक कर आयो रे वसंत!

हल्दी वर्ण  परिधान सजे साजन और सजनिया 
कुहुक- कुहुक ललचावे रे कोयलिया 
सौरभ की बयार लेके आयो रे वसंत 
शुभ रंगों का प्यार लेके आयो रे वसंत 
धामक -धूमक कर आयो रे वसंत!!




सोमवार, 23 जनवरी 2012

देखो शिखर सम खड़ा हुआ


यह कविता उन माता पिता के नाम जिन्होंने सर्व प्रथम बालिका शिक्षण की शुरुआत की !

सकुचाया सा डरा डरा
अनचाहा सा मरा मरा
कम्पित काया, भीरु मन
जाने कब हो जाए हनन
सघन तरु की छाया में
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआI
कितने ही बवंडर आये
उसके वजूद तक पंहुच ना पाये
तरु का आलंबन कड़ा हुआ
जड़ों से पीकर उसका क्षीर 
धीरे धीरे बड़ा हुआ
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआI
   
                बीते कितने पतझड़ ,बसंत
हुआ कद उसका और बुलंद
खुशबु उसकी यूँ महकाए
पंवरी ,चन्दन भी शर्माएI
अरि आलोचक मूक बनाये
अपने दम पर अड़ा हुआ
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआ I
फिर काल चक्र सम्पूर्ण हुआ
सघन तरु तन जीर्ण हुआ
फट गई काया मिट गया तन
पर मन में ना कोई चुभनI
कहाँ भीरुता ,दुर्बल तन
अब बन गया वो तरु सघन
मेरी धरोहर मेरा वंश
उसके ही दम से चला हुआ
वो देखो शिखर सम खड़ा हुआI
मेरा नन्हा पौधा,
मुझसे भी कद में बड़ा हुआ
मुझसे भी कद में बड़ा हुआ II
*****

सोमवार, 16 जनवरी 2012

वो जीवन भी क्या!!

वो दिल भी क्या जिसे कभी प्यार ना मिला 
वो इन्सां भी क्या जिसे कभी यार ना मिला !
वो दिन भी क्या जिसमे ख़ुशी का जाम  ना मिला 
वो स्वप्न भी क्या जिसे कोई अंजाम ना मिला !
वो आवाज ही क्या जिसे  कोई सुन ना सका 
वो गीत ही क्या जिसे कोई गुन ना सका !
वो परवाज ही क्या जो कभी उड़ ना सके   
वो राह ही क्या जो कभी मुड़ ना सके !
वो युद्द ही क्या जिससे  कभी अमन ना मिला 
वो जीवन ही क्या जिसे मरते वक़्त कफ़न ना मिला !