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शनिवार, 6 नवंबर 2010
दिवाली दीपों का त्यौहार है ,दीपक का अपना ही एक महत्व है, अलग अलग अवसर पर अपना योगदान है मेरे नजरिये से दीपक के कितने रूप हैं ......
मैं एक सदय नन्हा सा दीपक हूँ
मेरी व्यथा मेरे मोद-प्रमोद की कहानी
तुमको सुनाता हूँ आज अपनी जुबानी
मैं एक नन्हा सा दीपक हूँ !
मैं निर्धन की कुटिया का दिया
,चाहत ममता के साए में पला
माँ की अंजलि और आँचल की छाँव में जला
मैं जरूरतों का दिया ,मैं निर्धनता का दिया !
मैं महलों व् ऊँची अट्टालिकाओं का दिया
इसके तिमिर को मैंने जो दिया है उजाला
उन्ही उजालो ने मेरी हस्ती को मिटा डाला
मैं उपेक्षित सा दिया ,मैं जर्जर सा दिया !
मैं आरती का दिया
चन्दन ,कर्पुर ,धूप से उज्जवल भाल
मन्त्र स्त्रोतों में ढला चहुँ ओर पुष्पमाल
मैं अर्चना का दिया ,मैं पुष्पांजलि का दिया !
मैं शमशान का दिया
मैं जिनके करकमलों में ढला.जिनके लिए हर पल जला
उनकी शव यात्रा में आया हूँ
इहि लोक तज उह लोक की राह दिखाने आया हूँ
मैं सिसकता दिया ,मैं श्रधांजलि का दिया !
मैं एक नन्हा सा दीपक हूँ !!
मैं नन्हा दीपक बन गया शहीदों की अमर ज्योति
या समझो ख़ाक का या समझ लो लाख का मोती !!
मैं एक सदय नन्हा सा दीपक हूँ
मेरी व्यथा मेरे मोद-प्रमोद की कहानी
तुमको सुनाता हूँ आज अपनी जुबानी
मैं एक नन्हा सा दीपक हूँ !
मैं निर्धन की कुटिया का दिया
,चाहत ममता के साए में पला
माँ की अंजलि और आँचल की छाँव में जला
मैं जरूरतों का दिया ,मैं निर्धनता का दिया !
मैं महलों व् ऊँची अट्टालिकाओं का दिया
इसके तिमिर को मैंने जो दिया है उजाला
उन्ही उजालो ने मेरी हस्ती को मिटा डाला
मैं उपेक्षित सा दिया ,मैं जर्जर सा दिया !
मैं आरती का दिया
चन्दन ,कर्पुर ,धूप से उज्जवल भाल
मन्त्र स्त्रोतों में ढला चहुँ ओर पुष्पमाल
मैं अर्चना का दिया ,मैं पुष्पांजलि का दिया !
मैं शमशान का दिया
मैं जिनके करकमलों में ढला.जिनके लिए हर पल जला
उनकी शव यात्रा में आया हूँ
इहि लोक तज उह लोक की राह दिखाने आया हूँ
मैं सिसकता दिया ,मैं श्रधांजलि का दिया !
मैं एक नन्हा सा दीपक हूँ !!
मैं नन्हा दीपक बन गया शहीदों की अमर ज्योति
या समझो ख़ाक का या समझ लो लाख का मोती !!
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
सोलहवां सावन
सोलहवां सावन
न जाने कब सोलहवां सावन आया
रिम झिम बरसे बादल
हाथों की चूड़ी लगी कसने
औछा पड़ने लगा आँचल !
कब गुडिया लगी चिढाने
ओर गुड्डे लगे मन को भाने
दादी के किस्से फीके पड़ गए
प्रेम कहानी लगी रिझाने !
कब आँखों से नींदे लुट गई
ओर सपनो ने घर बसाया
लोरी का अब चला न जादू
जाने क्यों ये मन बौराया !
सयाने हुए कब संगी-साथी
ओर मेरी बचपन की सखियाँ
छूटी लुकाछिपी आँख मिचौली
भाने लगी कानों की बतियाँ !
फिर एसा वो दिन भी आया
माँ का आँगन हुआ पराया
वो लम्हे वो कल की बातें
बन गई मन की मीठी यादें !!
न जाने कब सोलहवां सावन आया
रिम झिम बरसे बादल
हाथों की चूड़ी लगी कसने
औछा पड़ने लगा आँचल !
कब गुडिया लगी चिढाने
ओर गुड्डे लगे मन को भाने
दादी के किस्से फीके पड़ गए
प्रेम कहानी लगी रिझाने !
कब आँखों से नींदे लुट गई
ओर सपनो ने घर बसाया
लोरी का अब चला न जादू
जाने क्यों ये मन बौराया !
सयाने हुए कब संगी-साथी
ओर मेरी बचपन की सखियाँ
छूटी लुकाछिपी आँख मिचौली
भाने लगी कानों की बतियाँ !
फिर एसा वो दिन भी आया
माँ का आँगन हुआ पराया
वो लम्हे वो कल की बातें
बन गई मन की मीठी यादें !!
रविवार, 17 अक्टूबर 2010
aaj ke raavan
आज के दम्भी रावण करदे इतना अहसान
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान ,
नहीं तो तेरा कल उन्ही पे चल के आएगा
फिर से इतिहास उसी सांचे में ढल जायेगा !
तब कौन सुनेगा तेरे दिल की जुबान
तू छोड़ नहीं जाना अपने क़दमों के निशान!
तेरे अपने तेरी मंजिल का पता पूछेंगे
उनपे चलने के लिए तेरे कदमो के निशान खोजेंगे
तू अपने दुष्कर्मो को छिपायेगा कंहा
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
वो कोई ओर थे जो कल भी पूजे जायेंगे
जिनके पदचिन्ह सही रास्ता दिखायेंगे
जिनकी याद में आज भी नतमस्तक है जहाँ
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
वो आजादी के लिए फिरते थे दरबदर
तुम आज पखेरू के पिंजरों से सजाते हो अपना घर
तू समझा ही कँहा अब तक आजादी की जुबान
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
उनके बलिदानों का तूने बनाया है उपहास
तार तार कर डाला है प्रकर्ति का लिबास
उज्जवल भविष्य अब तूने छोड़ा है कँहा
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
जिंदगी को तूने इक अभिशाप बना डाला
अमृत दिया था प्रभु ने उसमे विष मिला डाला
चहुँ ओर फैल रहा है आतंक का धुआं
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
तेरे कदमो पे चल के वो क्या पायेंगे
बहेतर है वो खुद नया जहाँ बनायंगे
कोन जाने फिर से हो रामराज्य वहां
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !!
सबको विजय दशमी की शुभ कामनाएं
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान ,
नहीं तो तेरा कल उन्ही पे चल के आएगा
फिर से इतिहास उसी सांचे में ढल जायेगा !
तब कौन सुनेगा तेरे दिल की जुबान
तू छोड़ नहीं जाना अपने क़दमों के निशान!
तेरे अपने तेरी मंजिल का पता पूछेंगे
उनपे चलने के लिए तेरे कदमो के निशान खोजेंगे
तू अपने दुष्कर्मो को छिपायेगा कंहा
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
वो कोई ओर थे जो कल भी पूजे जायेंगे
जिनके पदचिन्ह सही रास्ता दिखायेंगे
जिनकी याद में आज भी नतमस्तक है जहाँ
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
वो आजादी के लिए फिरते थे दरबदर
तुम आज पखेरू के पिंजरों से सजाते हो अपना घर
तू समझा ही कँहा अब तक आजादी की जुबान
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
उनके बलिदानों का तूने बनाया है उपहास
तार तार कर डाला है प्रकर्ति का लिबास
उज्जवल भविष्य अब तूने छोड़ा है कँहा
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
जिंदगी को तूने इक अभिशाप बना डाला
अमृत दिया था प्रभु ने उसमे विष मिला डाला
चहुँ ओर फैल रहा है आतंक का धुआं
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !
तेरे कदमो पे चल के वो क्या पायेंगे
बहेतर है वो खुद नया जहाँ बनायंगे
कोन जाने फिर से हो रामराज्य वहां
तू छोड़ नहीं जाना अपने कदमो के निशान !!
सबको विजय दशमी की शुभ कामनाएं
शनिवार, 9 अक्टूबर 2010
परिणय डोरी
हिय कँवल कब तक खिलेंगे लोचन की बंद तिजोरी में
तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में!!
सुध बुध भूला मन थके नयन बाँट जोहेते राहों में
तू ले चल मुझको डोली में सम्मोहन की बांहों में !!
पायल छेडे कंगना छेडे सखियाँ छेडे बरजोरी में
अंगीकार करो सर्वस्व समर्पण क्या रखा है चोरी में
प्रीत करे और मर्म ना जाने क्या बात है चाँद चकोरी में
तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में !!
हिय कँवल कब तक खिलेंगे लोचन की बंद तिजोरी में
तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में!!
सुध बुध भूला मन थके नयन बाँट जोहेते राहों में
तू ले चल मुझको डोली में सम्मोहन की बांहों में !!
पायल छेडे कंगना छेडे सखियाँ छेडे बरजोरी में
अंगीकार करो सर्वस्व समर्पण क्या रखा है चोरी में
प्रीत करे और मर्म ना जाने क्या बात है चाँद चकोरी में
तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में !!
सोमवार, 27 सितंबर 2010
chanda saajan
चंदा साजन
रजत हंस पर होकर सवार
रात गगन वत्स छत पर आया,
देख वर्च लावण्या उसका
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
वो समझा मैं सोई थी
मैं सुख सपनो में खोई थी
चूम वदन मेरा उसने
श्वेत किरण का जाल बिछाया,
हिय कपोत उसमे उलझाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
खुले थे चित्त कपाट मेरे
वो दबे पाँव चला आया
अधरों की अधीरता सुन आली
साजन कह कर दिल भरमाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
उसके बिन अब तो रह न सकुंगी
तूने देखा तो डाह करूंगी
चांदी की पालकी लाएगा
मुझे ब्याह ले जायेगा
मेरे लिए उसने गगन सजाया
पग पग तारों का जाल बिछाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
रजत हंस पर होकर सवार
रात गगन वत्स छत पर आया,
देख वर्च लावण्या उसका
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
वो समझा मैं सोई थी
मैं सुख सपनो में खोई थी
चूम वदन मेरा उसने
श्वेत किरण का जाल बिछाया,
हिय कपोत उसमे उलझाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
खुले थे चित्त कपाट मेरे
वो दबे पाँव चला आया
अधरों की अधीरता सुन आली
साजन कह कर दिल भरमाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
उसके बिन अब तो रह न सकुंगी
तूने देखा तो डाह करूंगी
चांदी की पालकी लाएगा
मुझे ब्याह ले जायेगा
मेरे लिए उसने गगन सजाया
पग पग तारों का जाल बिछाया
सुन री सखी वो मेरे मन भाया !!
बुधवार, 15 सितंबर 2010
अब क्या है जीवन के पार
जाना है क्षितिज के पार
आ मुझको पर देदे उधार
सुदूर गगन में मै भी जाऊं
बकुल मेखला में जुड़ जाऊं .
करूँ वहां अठ्खेलियन
जहाँ स्वछंदता अपरम्पार
आ मुझको पर देदे उधार .
शशि रवि की किरने लेकर
पवन अगन के संग खेलूं
अम्बर घट को विच्छेदित कर
उदक बूँद पंखों में भर लूं
परी लोक में हो आहार .
आ मुझको पर देदे उधार .
गहन घाटिओं के गुंजन पर कान धरूँ
अपने संगीत की गूँज सुनु
सर्वोन्नत चोटी को छूकर
फिर चहुँ और आलोकन करूँ
अब क्या है जीवन के पार
आ मुझको पर देदे उधार .
जाना है क्षितिज के पार
आ मुझको पर देदे उधार
सुदूर गगन में मै भी जाऊं
बकुल मेखला में जुड़ जाऊं .
करूँ वहां अठ्खेलियन
जहाँ स्वछंदता अपरम्पार
आ मुझको पर देदे उधार .
शशि रवि की किरने लेकर
पवन अगन के संग खेलूं
अम्बर घट को विच्छेदित कर
उदक बूँद पंखों में भर लूं
परी लोक में हो आहार .
आ मुझको पर देदे उधार .
गहन घाटिओं के गुंजन पर कान धरूँ
अपने संगीत की गूँज सुनु
सर्वोन्नत चोटी को छूकर
फिर चहुँ और आलोकन करूँ
अब क्या है जीवन के पार
आ मुझको पर देदे उधार .
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