you are welcome on this blog.you will read i kavitaayen written by me,or my creation.my thoughts about the bitterness of day to day social crimes,bad treditions .
यह ब्लॉग खोजें
सोमवार, 28 अक्टूबर 2019
शनिवार, 31 अगस्त 2019
बुधवार, 31 जुलाई 2019
बुधवार, 10 जुलाई 2019
शनिवार, 13 अप्रैल 2019
बुधवार, 13 फ़रवरी 2019
गुरुवार, 31 जनवरी 2019
शनिवार, 26 जनवरी 2019
बुधवार, 19 दिसंबर 2018
रविवार, 9 दिसंबर 2018
सोमवार, 3 दिसंबर 2018
बुधवार, 28 नवंबर 2018
शनिवार, 2 अप्रैल 2016
मेरे अन्दर कोई सैलाब उतारा उसने 'ग़ज़ल '
२१२२ ११२२ ११२२ २२
रमल
मुसम्मन मखबून मकतूअ
डूबते
वक़्त दिया जिसको सहारा उसने
कर
लिया पार उतरते ही किनारा उसने
फालतू
आज समझकर जो मुझे काट रहा
मेरी ही छाँव में बचपन था गुजारा उसने
देख
बदले हुए हालात हवाओं के रुख
मौज
में छोड़ दिया जिस्म-ए शिकारा उसने
बात
होने लगी बिन बात हमारी अक्सर
बज्म
में नाम लिया जबसे हमारा उसने
बाँटने
बोझ किसी को तो खुदा ने भेजा
देख
आसान किया काम तुम्हारा उसने
जात
औ धर्म की माचिस से लगा चिंगारी
खूब
आँखों से पिया खून-ए-नजारा उसने
कुछ
दिनों का ये जजीरा न रुका कोई यहाँ
जाना
पड़ता है तभी जब भी पुकारा उसने
देश
के वीर जवानों को सुनाकर गाली
मेरे
अन्दर कोई सैलाब उतारा उसने
राजेश कुमारी 'राज'
होली पर दोहा गीत 'सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर'
सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर
सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर
पिचकारी के मेह में,भीगे मन का मोर
होली के सद्भाव में ,मुखड़े मिले अनेक
नीले पीले रंग से ,हो जाते सब एक
एक सूत्र में बाँधती,कई रंग की डोर
सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर
द्वेष क्लेश का त्याग ही,होली मूल प्रतीक
लोग भुलाकर तल्खियाँ,आ जाएँ नजदीक
ढोली ढपड़े संग में ,हुड्दंगों के शोर
सतरंगी
चुनरी पहन,आई फागुन भोर
उपजी मन में भावना,शुद्द पर्व की साथ
प्रेम रंग से जुड़ गए,शत शत जोड़े हाथ
फीके फीके रंग ले ,कौन गया चितचोर
सतरंगी
चुनरी पहन,आई फागुन भोर
सच्चाई की जीत हो,यही पर्व का मर्म
जलती होली में मिटें ,सबके पाप अधर्म
सच्चाई से ही बँधा ,मृत्य लोक का छोर
सतरंगी
चुनरी पहन,आई फागुन भोर
राजेश कुमारी
शनिवार, 22 अगस्त 2015
सावन का कजरी गीत --आज मेरा भैया आएगा
रिमझिम सावन की फुहार आज मेरा भैय्या आएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
अम्बर पे बादल छाये
सखियों ने झूले पाए
भाभी ने गायी कजरी
बाबा जी घेवर लाए
कर लूँ अब मैं तनिक सिंगार आज मेरा भैया आएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
दीवार पे कागा बोले
यादों की खिड़की खोले
अम्मा ने संदेसा भेजा
सुनसुन मेरा मन डोले
मायके से आया तार आज मोरा भैया आएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
ननदी जी सुनो जरा सा
कुछ कर लो काम जरा सा
चौका बर्तन करने को
क्यूँ मन है डरा डरा सा
मुझसे मत करना तकरार आज मेरा भैया आएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
सासू जी खाना पकालो
अपने कुनबे को खिलालो
सैंया जी छोड़ो दफ्तर
दोनों बच्चों को सँभालो
अब मैं हो जाऊँ तैयार आज मेरा भैया आएगा
आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा
सोमवार, 27 जुलाई 2015
एक था भेंडर (संस्मरण व् सच्ची कथा)
जैसे ही कोई छुट्टी आती थी गाँव जाने का अवसर मिल जाता था चेहरा खिल उठता था मन की मुराद पूरी जो हो जाती थी एक तो दादा जी,
चाचा,चाची से मिलने की उत्सुकता दूसरे खेलने कूदने मस्ती करने की स्वछंदता हमेशा
गाँव की ओर खींचती थी| उत्सुकता का एक कारण और भी था वो था
कौतुहल से बच्चों की टोली में जुड़कर “भेंडर” की हरकतों का मजा लेना |
लेकिन उसका उपहास बनाने वालों को मैं पसंद नहीं करती थी|
घर वाले कहते थे उसे भेंडर नहीं भगत जी कहा करो हाँ कुछ गाँव वाले उसे भगत जी
कहते थे क्यूंकि भेंडर के नाम से वो चिढ़ता था और बच्चों को उसे चिढाने में बहुत
मजा आता था|
वो सबके घर जाकर बारी-बारी से खाना माँगने जाता था| मैं बहुत छोटी थी फिर भी मुझे
उसके पास जाने में डर नहीं लगता था थाल में खाना देकर आती थी वो बहुत प्यार भरी
नजरों से मुझे देखता पास जाने पर सिर पे हाथ फिराता था|
मुझे याद है वो बहुत बदसूरत था
डरावना चेहरा था जिसका कारण हमे पता चला था कि एक बार होली दहन पर शरारती बच्चों
ने उसे आग में धक्का दे दिया था जिसकी वजह से वो बदशक्ल हो गया था| गाँव के आधे लोग
जहाँ उससे सहानुभूति रखते वहीँ कुछ लोग उसकी इस अवस्था से फायदा भी उठाते थे| पूरे
दिन खेत में काम करवाते तब जाकर दो रोटी फेंक देते|एक दो बार तो मैंने भी उसको रहट
खींचने के लिए बैल के साथ जुड़े देखा हालांकि उसके बाद गाँव के भले लोगों ने पंचायत
कर उन लोगों का हुक्का पानी भी कुछ दिन के लिए बंद किया|
भेंडर की दो ख़ास बात बताना चाहूँगी एक तो जब वो अकेला होता था वो रो रो कर ओ
भाई ,ओ भाई तू कहाँ है अब आजा कह कह कर चिल्लाता था रात को दूर तक उसकी आवाजें
जाती थी| दूसरे बच्चे व् कुछ बड़े भी जब उसे भेंडर तेरी लच्छो कह कर भागते थे तो
उसकी आँखों में खून उतर आता था वो पत्थर मारने शुरू कर देता था हमे उस वक़्त कुछ भी
समझ नहीं आता था|
लेकिन जब वो खुश होता तो वो लोगों का भविष्य भी बता देता था जो सच भी निकलता
था तब से उसका नाम भगत जी भी पड़ गया|
बचपन में भेंडर कौन था,हमारे गाँव में
कहाँ से आया था,उसकी विक्षिप्तता का क्या कारण था ये सब जानने की ना ही उम्र थी ना
ही कोई जिज्ञासा|
पिछले दिनों गाँव में किसी कारण जाना हुआ तो अपने बचपन की बातों में भेंडर का
जिक्र आया तो किसी ने कहा उसके जीवन पर कुछ लिखो उसी वक़्त मेरे मन में इस सस्मरण
ने जन्म लेना शुरू कर दिया|
अब वक़्त था कि अपने कुछ बुजुर्गों से अपने बड़े भाई से भेंडर के जीवन की गाथा
सुनूँ |.....
माता पिता के देहांत के बाद दो भाइयों को बहन लच्छो अपनी ससुराल अपने पास ले
जाती है वहाँ उसकी ससुराल वाले उनको स्वीकार नहीं करते बहन जीवन में संघर्ष करती
है उनसे मजदूरों की तरह काम लिया जाता है तब रोटी मिलती है|धीरे-धीरे किशोरावस्था
में कदम रखते हैं एक मनहूस दिन चेचक ऊपर से घरवालों की मार से बहन दम तोड़ देती है|
दर्द और नफरत हद से ज्यादा बढ़ने पर बड़े भाई से जीजा का खून हो जाता है और
रातोरात दोनों भाई जंगल जंगल भागते-भागते किसी दूर गाँव में पंहुच जाते हैं कुछ
साल गुजरते हैं फिर वो गाँव भी छोड़ना पड़ जाता है बहन के गम में तथा जमाने की ठोकरों से तब भेंडर की मानसिक अवस्था
गड़बड़ाने लगती है
लगभग तीस साल की उम्र में दोनों भाई हमारे गाँव में पँहुचे बड़ा भाई काम करने
लगा छोटे भाई का इलाज व् खाने पीने का काम चलने लगा मगर दुर्भाग्य ने पीछा नहीं
छोड़ा एक दिन बड़े भाई का बस से एक्सीडेंट हो गया और वो चल बसा|भाई की चिता को अग्नि
देते वक़्त भेंडर इतनी जोर से चिल्लाया कि
सब सहम गए|उस दिन से भेंडर होशोहवास खो बैठा उसकी जिंदगी ,भूखा पेट दूसरों के
रहमोकरम पर टिक गया |
जो भी दया करता उसे नहला कर नए कपड़े पहना देता| गाँव का कोई घर ऐसा नहीं था
जहाँ उसने काम न किया हो धीरे धीरे गाँव का वो एक अहम् हिस्सा हो गया|बीमार होने
पर गाँव के ही डॉक्टर उसकी चिकित्सा को उसके पास ही पंहुच जाते थे|एक दिन दिखाई न
दे तो गाँव वाले उसे ढूँढने निकल पड़ते थे बारिश, धूप में अपने यहाँ आसरा देते थे
उसका कोई घर नहीं था बाद में पूरा गाँव ही उसका घर बन गया था |
अब भेंडर की उम्र अस्सी साल की हो चुकी थी अपनी लाचारी से बहुत परेशान था| आज
से लगभग बीस पच्चीस साल पहले उस रात बहुत
समय बाद
लोगों ने उसकी दर्द भरी आवाज फिर से सुनी ..ओ भाई ओ भाई अब आजा ...ओ भाई अब आजा ....
और अगली सुबह गाँव में आग की तरह खबर दौड़ गई कि भेंडर का शव सड़क के बीचोबीच
खून से लथपथ पड़ा था जो भयंकर सर्दी के कारण लकड़ी की तरह अकड़ चुका था|
उसकी अंतिम यात्रा में आसपास के गाँव के भी
इतने लोग जुड़े कि कभी पहले
किसी बड़े आदमी की यात्रा में नहीं देखे.गए|
आज हमारे गाँव में शुरू में ही उसकी
समाधि बनी हुई है कोई भी गाँव में
घुसने से पहले उसे शीश झुकाना नहीं भूलता|
मैं भी भगत जी को नमन करते हुए ये
संस्मरण समाप्त करती हूँ| भगवान अपने वहाँ तो उसे सुख शान्ति प्रदान करे... ॐ
शान्ति |
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
शनिवार, 7 मार्च 2015
हरियाणवी गीत (हास्य व्यंग्य ) म्हारे गाम की होळी
बुरा णा मान्नो होळी सः
खेल्यां खेल्यां मैं तो पक गी ,इन शहरां की होळी तः
म्हारे गाम की बात निराळी,ये भी कोई होळी सः
रंग णा चोक्खे इन शहरां के ,केमीकल की झिक झिक सः
म्हारे गाम का गोबर कीचड, ही सबते ओरगेनिक सः
ह्याँ होळी में डरें छोरियाँ,खुली हवा णा पावैं सः
आँख मार दी किसी छोरे ने ,खून णा इनमे
पावे सः
म्हारे गाम के बिगड़े छोरे ,यूँ काब्बू में आवें सः
तोड़ के गोड्डे हाथ मा देदे , छोरी लट्ठ चलावें सः
कई भेंसा का दूध गटक कर ,ऐसा रंग जमावें सः
पूंछ दबाकर सारे छोरे ,खेत्तां में छुप जावैं सः
हर होळी में सारी लुगाई,मर्दों को हडकावें सः
सभी लिकाड़ें मन की अपणी नू सोट्टे बरसावें सः
फागण फागण खेल खाल के, दिन भर जब थक जावैं सः
घर मा आके सारे मर्दां,उनकी टांग दबावें सः
खेल्यां खेल्यां मैं तो पक गई,इन शहरां की होळी तः
म्हारे गाम की बात निराळी,ये भी कोई होळी सः
-------------------
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
