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बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बही पीर दिलसे पिघलते- पिघलते (एक ही बहर की दो ग़ज़ल )


बही पीर दिलसे पिघलते- पिघलते




रुकी जब फ़लक से नमी ढलते ढलते  
दिखे वो जरा रुख बदलते- बदलते 

जमी थी किनारों पे लालच की काई 
बचे हम जरा सा फिसलते फिसलते 

हमारे बिखरने की चिंता करना 
बहल जाएगा दिल बहलते बहलते 

जला ले खुद को खुदी की अगन से 
कहा हिम ने रवि से पिघलते पिघलते 

सुना जब हवाएं करेंगी बगावत 
रुके हम वहां से निकलते निकलते 

कहा गुल ने बुलबुल से पलकें बिछा कर 
चली फिजाँ में टहलते टहलते 

जरा तू मुझे पाँव से आके छू ले 
कहा इक लहर ने मचलते मचलते 

गुनाहों के दल दल से 'राज' बचना
बढ़ाना  कदम ये संभलते संभलते 
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राजेश कुमारी "राज"

17 टिप्‍पणियां:


  1. गुनाहों के दल दल से ऐ 'राज' बचना
    बढ़ाना कदम ये संभलते संभलते
    क्‍या बात है ... हर शेर जबरदस्‍त
    बधाई इस उम्‍दा प्रस्‍तुति के लिये

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  2. बहुत खूब ... लाजवाब गज़ल ओर उसके सभी शेर ...

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  3. दोनों ही गजलें बेहद उम्दा..प्रस्तुतीकरण अनुपम है..

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  4. अनुपम प्रस्तुतीकरण के साथ..
    अप्रतिम गजल....
    बहुत ही बेहतरीन...
    :-)

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  5. वाह वाह...
    बहुत बढ़िया राजेश जी...
    सुन्दर गज़लें...

    सादर
    अनु

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  6. बहुत उम्दा सभी शेर एक से बढ़कर एक बेहद लाजबाब अभिव्यक्ति ,,,

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर...

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  7. दोनों ही गज़लें बेहतरीन .......

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  8. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  9. गुनाहों के दल दल से ऐ 'राज' बचना
    बढ़ाना कदम ये संभलते संभलते
    आदरणीया सादर अभिवादन स्वीकार करे ,प्रत्येक पंक्ति में गजब की भावाभिव्यक्ति ,अंतिम पंक्ति में जानदार अनुभव का शानदार चित्रण ,दोनों गजल लाजबाब बहुत बहुत शुभ कामनाये

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  10. दोनों ही गजलों में शानदार भाव और शब्द संयोजन है। वधाई !

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  11. बड़ी प्यारी ग़ज़ल ..
    हर पंक्ति दिल छूती है ..
    शुभकामनायें आपको !

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