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गुरुवार, 21 अगस्त 2014

राखी (लघु कथा )


“भाभी अगर कल तक मेरी राखी की पोस्ट आप तक नहीं पँहुची तो परसों मैं आपके यहाँ आ रही हूँ  भैया से कह देना ” कह कर रीना ने फोन रख दिया|
अगले दिन भाभी ने सुबह ११ बजे ही फोन करके कहा ‘रीना राखी

 पँहुच गई हैं” पर भाभी मैंने तो इस बार राखी पोस्ट ही नहीं की थी!!! ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

रविवार, 10 अगस्त 2014

रक्षाबंधन विशेष (माहिया विधा पर आधारित)

ऋतु बड़ी सुहानी है 
घर आ जा बहना 
राखी बँधवानी है ||
अम्बर पे बदरी है 
भैया आ जाओ 
तरसे मन गगरी है |
बहना अब दूरी है 
कैसे आऊँ मैं 
मेरी मजबूरी है ||
कोई मजबूरी ना
आ न सको भैया 
इतनी भी दूरी ना ||
नखरे थे वो झूठे 
मैं आ जाऊँगा 
बहना तू क्यूँ रूठे |
परदेश बसी बहना 
रक्षा बंधन है 
बस तेरा खुश रहना |
चंदा भी मुस्काया 
राखी बँधवाने 
प्यारा भैया आया ||
पूजा की थाली है 
हल्दी का टीका 
राखी नग वाली है ||
राखी तो बांधेगी 
मुँह करके मीठा 
तू नेग भी मांगेगी ||
आगे कलाई करो 
नेग न मांगू मैं
बस सिर पे हाथ धरो||
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बुधवार, 30 जुलाई 2014

वो पीपल का पेड़ (गीतिका छंद)


वृक्ष पीपल का खड़ा है, आज भी उस गाँव में
बचपना मैंने गुजारा, था उसी की छाँव में  
तीज में झूला झुलाती,गुदगुदाती  मस्तियाँ  
गीत सावन के सुनाती ,सरसराती पत्तियाँ

गुह्य पुष्पक दिव्य अक्षय,प्लक्ष इसके नाम हैं  
मूल में इसके सुशोभित, देवता के  धाम हैं
स्वास्थ वर्धक ,व्याधि रोधक,बूटियों की खान है
पूजते हैं लोग इसको  ,शुद्ध संस्कृति वान है   

गाँव का इतिहास उसकी ,तंत्रिकाओं में रमा  
मूल में उसकी किसानों,का पसीना है जमा  
गाँव की पंचायते ,चौपाल भी जमती वहाँ
गर्मियों की चिलचिलाती धूप भी थमती वहाँ


चेतना  की ग्रंथियों को, आज भी वो  खोलता
झुर्रियों में आज उसका, आत्मदर्पण बोलता
शाख पर जिसके लटकती ,आस्था की हांडियाँ
                   झुरझुरी वो ले रही हैं,देख अब कुल्हाड़ियाँ                                                        

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शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

झुकी उस डाल में हमको कई चीखें सुनाई दें (ग़ज़ल 'राज')

तुम्हारे पाँव से कुचले हुए गुंचे दुहाई दें  
फ़सुर्दा घास की आहें हमें अक्सर सुनाई दें

तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार दिखता है
हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें

तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है मजे से तोड़ते कलियाँ
झुकी उस डाल में  हमको कई चीखें सुनाई दें

कहाँ महफ़ूज़ वो माँ दूध से जिसने हमे पाला
झुका देती जबीं अपनी सजाएँ जब कसाई दें

उड़े कैसे भला तितली लगे हैं घात में शातिर
ख़ुदा की रहमतें ही बस उन्हें अब तो रिहाई दें   

न कोई दर्द होता है लहू को देख कर तुमको
तुम्हें आती हँसी जब सिसकियाँ भर भर दुहाई दें

करें फ़रियाद कब किससे जहाँ में कौन है किसका
सितम गर रूहें, खुद रब की अदालत में सफ़ाई दें 


फ़सुर्दा =मुरझाई हुई
महफ़ूज़ =सुरक्षित
जबीं =माथा 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

असंतुष्टि (अतुकांत )

एक बाजू गर्वीला पर्वत
अपनी ऊँचाई और धवलता पर इतराता
क्यूँ देखेगा मेरी ओर?
नजरें झुकाना तो उसकी तौहीन है न!   
दूजी बाजू छिः !! यह तुच्छ बदसूरत बदरंग शिलाखंड  
मैं क्यूँ देखूँ इसकी ओर
कितना छोटा है यह
मेरी इसकी क्या बराबरी  
समक्ष,परोक्ष ये ईर्ष्यालू भीड़ उफ्फ!!
जब सबकी अपनी-अपनी अहम् की लड़ाई
और मध्य में वर्गीकरण की खाई
फिर क्यूँ शिकायत अकेलेपन से!! 
अपने-अपने दायरे में

संतुष्ट क्यूँ नहीं?? 
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रविवार, 29 जून 2014

चश्मा (लघु कथा )



“देखो नेहा वो अभी भी घूर रहा है” झूमू ने नेहा का हाथ पकडे-पकडे हरकी पैढ़ी पर  गंगा में डुबकी लगाते हुए कहा|”बहुत बेशर्म है अभी भी बैठा है इसको पता नहीं किस से पाला  पड़ा है, इसका मजनू पना अभी उतारते हैं शोर मचाकर” उसको थप्पड़ दिखाती हुई नेहा आस पास के लोगों को उकसाने लगी|
इसी बीच में न जाने कब झूमू का हाथ छूट गया और वो तीव्र बहाव में बहने लगी|छपाक के साथ आवाज आई और कुछ ही देर में वो युवक झूमू को बचाकर बाहर निकाल लाया|
थोड़ी दूर  खड़ा एक पुलिस वाला भी आ गया और  “बोला इन साहब का शुक्रिया अदा करो ये इंटरनेश्नल स्वीमर चेम्पियन स्वप्निल झा जी  हैं जो हरिद्वार घूमने आये थे और  निःस्वार्थ एक महीने से लोगों की हेल्प कर रहे हैं न जाने कितने डूबते हुए  लोगों को बचा चुके हैं” |

अपलक देखती नेहा को वो युवक  बोला “ मैडम अपनी आँखों से  ये चश्मा उतारिये जो सिर्फ एक ही रंग देखता है  दुनिया में और भी रंग हैं” !!!!          

शनिवार, 21 जून 2014

सरस्वती वंदना (उल्लाला छंद पर आधारित)

हे माँ श्वेता शारदे विद्या का उपहार दे|
श्रद्धानत हूँ प्यार दे मति नभ को विस्तार दे||
तू विद्या की खान है ,जीवन का अभिमान है|
भाषा का सम्मान है ,ज्योतिर्मय वरदान है||
नव शब्दों को रूप दे ,सदा ज्ञान की धूप दे|
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
कमलं पुष्प विराजती ,धवलं वस्त्रं  शोभती|
वीणा कर में साजती ,धुन आलौकिक बाजती||
विद्या कलष अनूप दे,आखर-आखर कूप दे
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
निष्ठा तू विश्वास तू ,हम भक्तों की आस तू|
सद्चित्त का आभास तू ,करती तम का ह्रास तू||
तम सागर से तार दे ,प्रज्ञा का आधार दे|
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
वाणी में तू रस भरे ,गीतों  को समरस करे|
जीवन को  रोशन करे
,तुझसे ही माँ तम डरे||
रस छंदों का हार दे ,कविता ग़ज़ल हजार दे|
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
जिस को तेरा ध्यान है 
,मन में तेरा मान है|
तेरे तप का  भान है ,मानव वो विद्वान है||
जीवन में मत हार दे ,भावों में उपकार दे|
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
धवल हंस सद् वाहिनीनिर्मल सद्मति  दायिनी|
           जड़ मति विपदा हारिणी ,भव सागर तर तारिणी||                                                                                 सब कष्टों से तार दे,शिक्षा का भण्डार दे|
हे माँ श्वेता शारदे ,विद्या का उपहार दे||
हे माँ श्वेता शारदेश्रद्धानत हूँ प्यार दे||
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