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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

उन्मत्त परिन्दा (अतुकांत )

तोड़ नीड़ की परिधि
लांघ कर सीमाएं
भुला  नीति रीति
सारी वर्जनाएं
छोड़ संयम की कतार
दे परवाज़ को विस्तार
वशीकरण में बंधा
लिए एक अनूठी चाह
कर बैठा गुनाह
लिया परीरू चांदनी का चुम्बन
जला बैठा अपने पर
उसकी शीतल पावक चिंगारी से
गिरा औंधें मुहँ
नीचे नागफनी ने डसा
खो दिया परित्राण
ना धरा का रहा
ना गगन का
बन बैठा त्रिशंकु
वो उन्मत्त परिंदा
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मंगलवार, 18 मार्च 2014

होली के बाद

होली खेल कर थका मांदा
अधखुली पलकों से पलंग पर लेटा था
उसका सर मेरी पेशानी पर झुका था
उसकी सुनहरी लटें चेहरे पर
गुदगुदी पैदा कर रही थी
 उसने अधरों की कोमल पंखुड़ियों
से मेरे गाल को स्पर्श किया
तो उस वक़्त मैं खुद को
दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान
समझ रहा था  
अचानक दो गर्म बूंदे मेरे मुख पर पड़ी
उसे आज जुकाम था
 अचानक उसने अपने दो दांत
मेरे गाल पर गड़ा दिए
मैं चीखा तो वो हँसने लगी
मैंने लपक कर उसे बाँहों में
भर लिया तो पूरा गीला हो गया
फिर मैं  जोर से बोला

अजी सुनती हो इसका डाइपर बदल दो 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

होली की शुभकामनायें

होली में मत भूलिये ,आँखें हैं अनमोल|
इक दूजे पर डालिये ,पुष्प रंग के घोल||
पुष्प रंग के घोल ,मलें खुश हों हमजोली|
             रहे जोश में होश ,वही है सच्ची होली||


देखो आये साथियों,होली के हुडदंग|
दरवाजे पर बज रहे,ढ़ोला फाग  मृदंग||  
ढ़ोला फाग  मृदंग, नशेडी नचते आये| 
झूमे पीकर भंग ,संग गर्दभ भी लाये||
              फेंको फेंको रंग , भरी कुण्डलिया  फेंको|                          पकड़ो ब्लोगर आज ,छोड़ मत देना देखो||                 

रविवार, 16 फ़रवरी 2014

साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक(ग़ज़ल )

जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक

हीर राँझे की कहानी हो  बसी जिसमे
ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक

प्यार का सैलाब जाने कब बहा लाया
हम सदा डरते रहे आँसू बहाने तक

थी बहुत मासूम अपने प्यार की मिटटी
दर्द ही बोते रहे अपने बेगाने तक

क्यों करें परवाह हम अब इस ज़माने की
हर कदम पे जो मिला बस दिल दुखाने तक 


छोड़ दी किश्ती भँवर में आज ये साथी  
जिंदगी गुजरे फ़कत अब इक फ़साने तक

तू मेरा महबूब अब ये जिंदगी तेरी
खूब गुजरेगी ख़ुदा के पास जाने तक

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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

जय जय प्रीत दिवस (हास्य व्यंग्य )

कुण्डलिया 
चंदा बरसाता अगन ,सूरज देखो ओस
मूँछ एँठ जुगनू कहे ,चल मैं आया बॉस
चल मैं आया बॉस ,शमा को नाच नचाऊं
कर लूँ दो-दो हाथ ,शलभ को प्रीत सिखाऊं
मेरी देख उड़ान ,भाव भँवरे का मंदा
तितली करती डाह ,मिटे फूलों पर चंदा

||तीन दोहे|| 
   दिल सागर में आज क्यों ,उठे प्रेम का ज्वार|
देकर  लाल गुलाब को ,करते हैं इजहार||

परसों नभ को दिल दिया,कल धरा को रोज|
   चाँद आज मन में बसा,रवि को किया प्रपोज||

 कलिका से प्रोमिस करें ,तितली को दें डेट|
  इन भँवरों का क्या धरम ,कहें सुमन से वेट||  

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

नारी के संघर्ष

नारी पत्थर सी हुई ,दिन भर पत्थर तोड़। 
उसके दम से घर चले ,पैसा- पैसा  जोड़॥  

राह  तकें बालक कहीं ,भूखे पेट अधीर। 
पूर्ण करेगी काम ये ,पीकर थोडा नीर॥ 
 
तोड़- तोड़ के गिट्टियां ,हुई सुबह से शाम। 
पेट अगन के सामने ,नहीं जटिल ये काम॥ 
  
जीवन है संघर्षमय ,किस्मत से  बेहाल।  
इन  हाथों में शस्त्र हैं ,तसला और कुदाल॥ 

तोड़ तोड़ पत्थर  करें ,उच्च भवन निर्माण। 
खुद की सीली झोंपड़ी,जिसमे निकले प्राण॥   

                  

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

कितनी कहावतें ||दोहे||


कष्ट सहे जितनी यहाँ,डालो उन पर धूल|
अंत भला सो सब भला ,बीती बातें भूल||

विद्या वितरण से खुलें ,क्लिष्ट ज्ञान के राज|
कुशल तीर से ही सधे ,एक पंथ दो काज||

कृष्ण काग खादी पहन,भूला अपनी जात|
चार दिवस की चाँदनी,फिर अँधियारी रात||

जिसके दर पर रो रहा , वो है भाव विहीन|
फिर क्यों आगे भैंसके,बजा रहा तू बीन||

सफल करो उपकार में,जीवन के दिन चार|
अंधे की लाठी पकड़ ,सड़क करा दो पार||

       
विटप बिना जो नीर के ,जड़ से सूखा जाय|
 सावन का अंधा उसे ,हरा हरा बतलाय||


बुरी बला लालच समझ ,मन का तुच्छ विकार|
जितनी चादर ढक सके ,उतने पैर पसार||

तू देखेगा और का ,भगवन तेरा हाल|
बस करके नेकी यहाँ ,दरिया में तू डाल||

             लाया क्या कुछ साथ तू ,जो ले जाए साथ|
              छूटेगा सब कुछ यहाँ ,जाना खाली हाथ||

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