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सोमवार, 27 जुलाई 2015

एक था भेंडर (संस्मरण व् सच्ची कथा)


जैसे ही कोई छुट्टी आती थी गाँव जाने का अवसर मिल जाता था चेहरा खिल उठता था  मन की मुराद पूरी जो हो जाती थी एक तो दादा जी, चाचा,चाची से मिलने की उत्सुकता दूसरे खेलने कूदने मस्ती करने की स्वछंदता हमेशा गाँव की ओर खींचती थी| उत्सुकता का एक कारण और भी था वो था 
कौतुहल से बच्चों की टोली में जुड़कर “भेंडर” की हरकतों का मजा लेना |
लेकिन उसका उपहास बनाने वालों को मैं पसंद नहीं करती थी|
घर वाले कहते थे उसे भेंडर नहीं भगत जी कहा करो हाँ कुछ गाँव वाले उसे भगत जी कहते थे क्यूंकि भेंडर के नाम से वो चिढ़ता था और बच्चों को उसे चिढाने में बहुत मजा आता था|
वो सबके घर जाकर बारी-बारी से खाना माँगने जाता था| मैं बहुत छोटी थी फिर भी मुझे उसके पास जाने में डर नहीं लगता था थाल में खाना देकर आती थी वो बहुत प्यार भरी नजरों से मुझे देखता पास जाने पर सिर पे हाथ फिराता था|
  मुझे याद है वो बहुत बदसूरत था डरावना चेहरा था जिसका कारण हमे पता चला था कि एक बार होली दहन पर शरारती बच्चों ने उसे आग में धक्का दे दिया था जिसकी वजह से वो बदशक्ल हो गया था| गाँव के आधे लोग जहाँ उससे सहानुभूति रखते वहीँ कुछ लोग उसकी इस अवस्था से फायदा भी उठाते थे| पूरे दिन खेत में काम करवाते तब जाकर दो रोटी फेंक देते|एक दो बार तो मैंने भी उसको रहट खींचने के लिए बैल के साथ जुड़े देखा हालांकि उसके बाद गाँव के भले लोगों ने पंचायत कर उन लोगों का हुक्का पानी भी कुछ दिन के लिए बंद किया|
भेंडर की दो ख़ास बात बताना चाहूँगी एक तो जब वो अकेला होता था वो रो रो कर ओ भाई ,ओ भाई तू कहाँ है अब आजा कह कह कर चिल्लाता था रात को दूर तक उसकी आवाजें जाती थी| दूसरे बच्चे व् कुछ बड़े भी जब उसे भेंडर तेरी लच्छो कह कर भागते थे तो उसकी आँखों में खून उतर आता था वो पत्थर मारने शुरू कर देता था हमे उस वक़्त कुछ भी समझ नहीं आता था|
लेकिन जब वो खुश होता तो वो लोगों का भविष्य भी बता देता था जो सच भी निकलता था तब से उसका नाम भगत जी भी पड़ गया|
 बचपन में भेंडर कौन था,हमारे गाँव में कहाँ से आया था,उसकी विक्षिप्तता का क्या कारण था ये सब जानने की ना ही उम्र थी ना ही कोई जिज्ञासा|           
पिछले दिनों गाँव में किसी कारण जाना हुआ तो अपने बचपन की बातों में भेंडर का जिक्र आया तो किसी ने कहा उसके जीवन पर कुछ लिखो उसी वक़्त मेरे मन में इस सस्मरण ने जन्म लेना शुरू कर दिया|
अब वक़्त था कि अपने कुछ बुजुर्गों से अपने बड़े भाई से भेंडर के जीवन की गाथा सुनूँ |.....
माता पिता के देहांत के बाद दो भाइयों को बहन लच्छो अपनी ससुराल अपने पास ले जाती है वहाँ उसकी ससुराल वाले उनको स्वीकार नहीं करते बहन जीवन में संघर्ष करती है उनसे मजदूरों की तरह काम लिया जाता है तब रोटी मिलती है|धीरे-धीरे किशोरावस्था में कदम रखते हैं एक मनहूस दिन चेचक ऊपर से घरवालों की मार से बहन दम तोड़ देती है|
दर्द और नफरत हद से ज्यादा बढ़ने पर बड़े भाई से जीजा का खून हो जाता है और रातोरात दोनों भाई जंगल जंगल भागते-भागते किसी दूर गाँव में पंहुच जाते हैं कुछ साल गुजरते हैं फिर वो गाँव भी छोड़ना पड़ जाता है बहन के गम में तथा जमाने  की ठोकरों से तब भेंडर की मानसिक अवस्था गड़बड़ाने लगती है  
लगभग तीस साल की उम्र में दोनों भाई हमारे गाँव में पँहुचे बड़ा भाई काम करने लगा छोटे भाई का इलाज व् खाने पीने का काम चलने लगा मगर दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा एक दिन बड़े भाई का बस से एक्सीडेंट हो गया और वो चल बसा|भाई की चिता को अग्नि देते वक़्त भेंडर इतनी जोर  से चिल्लाया कि सब सहम गए|उस दिन से भेंडर होशोहवास खो बैठा उसकी जिंदगी ,भूखा पेट दूसरों के रहमोकरम पर टिक गया |
जो भी दया करता उसे नहला कर नए कपड़े पहना देता| गाँव का कोई घर ऐसा नहीं था जहाँ उसने काम न किया हो धीरे धीरे गाँव का वो एक अहम् हिस्सा हो गया|बीमार होने पर गाँव के ही डॉक्टर उसकी चिकित्सा को उसके पास ही पंहुच जाते थे|एक दिन दिखाई न दे तो गाँव वाले उसे ढूँढने निकल पड़ते थे बारिश, धूप में अपने यहाँ आसरा देते थे उसका कोई घर नहीं था बाद में पूरा गाँव ही उसका घर बन गया था |
अब भेंडर की उम्र अस्सी साल की हो चुकी थी अपनी लाचारी से बहुत परेशान था| आज से लगभग बीस पच्चीस  साल पहले उस रात बहुत समय  बाद  लोगों ने उसकी दर्द भरी आवाज फिर से सुनी ..ओ भाई ओ भाई  अब आजा ...ओ भाई अब आजा ....
और अगली सुबह गाँव में आग की तरह खबर दौड़ गई कि भेंडर का शव सड़क के बीचोबीच खून से लथपथ पड़ा था जो भयंकर सर्दी के कारण लकड़ी की तरह अकड़ चुका था|     
उसकी अंतिम यात्रा में आसपास के गाँव के भी  इतने लोग जुड़े कि कभी पहले        
किसी बड़े आदमी की यात्रा में नहीं देखे.गए|                
आज हमारे गाँव में शुरू में ही उसकी  समाधि बनी हुई है कोई भी  गाँव में घुसने से पहले उसे शीश झुकाना नहीं भूलता|
 मैं भी भगत जी को नमन करते हुए ये संस्मरण समाप्त करती हूँ| भगवान अपने वहाँ तो उसे सुख शान्ति प्रदान करे... ॐ शान्ति |



मंगलवार, 21 जुलाई 2015

सावन के झूले



कुण्डलिया छंद 
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सखियाँ झूला झूलती ,मिलकर देखो चार|
तीजो के त्यौहार में ,करके नव सिंगार||
करके नव सिंगार ,पहन परिधान सजीला|
सजे किनारी लाल ,रंग साड़ी का पीला||
गजरा पहने श्वेत ,श्याम कजरारी अखियाँ|
बढ़ा रही दो पेंग ,साथ बैठी दो सखियाँ||

शनिवार, 7 मार्च 2015

हरियाणवी गीत (हास्य व्यंग्य ) म्हारे गाम की होळी

 बुरा णा मान्नो होळी सः
खेल्यां खेल्यां मैं तो पक गी ,इन शहरां की होळी तः
म्हारे गाम की बात निराळी,ये भी कोई होळी सः
रंग णा चोक्खे इन शहरां के ,केमीकल की झिक झिक सः
म्हारे गाम का गोबर कीचड, ही सबते ओरगेनिक सः
ह्याँ होळी में डरें छोरियाँ,खुली हवा णा पावैं सः
आँख मार दी किसी छोरे ने ,खून णा  इनमे पावे सः
म्हारे गाम के बिगड़े छोरे ,यूँ काब्बू में आवें सः
तोड़ के गोड्डे हाथ मा देदे , छोरी लट्ठ चलावें सः
कई भेंसा का दूध गटक कर ,ऐसा रंग जमावें सः
पूंछ दबाकर सारे छोरे ,खेत्तां में छुप जावैं सः
हर होळी में सारी लुगाई,मर्दों को हडकावें सः
सभी  लिकाड़ें मन की अपणी नू  सोट्टे  बरसावें सः
फागण फागण खेल खाल के, दिन भर जब थक जावैं सः
घर मा आके सारे मर्दां,उनकी टांग  दबावें सः
खेल्यां खेल्यां मैं तो पक गई,इन शहरां की होळी तः

म्हारे गाम की बात निराळी,ये भी कोई होळी सः 
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

नेता जी (त्रिभंगी छंद)

त्रिभंगी छंद
हे भोले बकुले , श्यामल नकुले, अभिनय तेरा चोखा  है|
यूँ बैठा उखडू ,जैसे कुकडू ,कर को  जोड़े  ,धोखा है||
तेरे हथकंडे ,मत के फंडे, जाने सब ये, नारी है|
हे उजले तन के, गिरगिट मन के, जनता तुझपे, भारी है||


भांडे धुलवाओ,कुछ करवाओ, वोट मुझी को ,देना जी|
 सड़कें जापानी, बिजली पानी,वादा हमसे,लेना जी||
 हे सीता माता ,लक्ष्मण भ्राता, मैं सेवक हूँ ,बस तेरा|  
 मूँछे मुडवाऊँ, विष पी जाऊँ, जो वादे से,मुँह फेरा|| 

हाथों को जोड़े ,छल को ओढ़े, जन मत मांगे, नेता जी|
झूठी यादों का, बस वादों का ,पांसा फेंके, नेता जी||
वोटों की खातिर,नस नस शातिर, आये चलके, नेता जी|
दिल की मक्कारी, नीयत सारी,मुख पे झलके,नेता जी||
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बुधवार, 17 दिसंबर 2014

लोग हुनरमंद कितने किसी को गुमाँ तक नहीं होता ग़ज़ल (राज )

लोग हुनरमंद कितने किसी को गुमाँ तक नहीं होता
आग लगाते वो कुछ इस तरह जो धुआँ तक नहीं होता

जह्र फैलाते हुए उम्र गुजरी भले  बाद में उनकी
मैय्यत उठाने कोई यारों का कारवाँ तक नहीं होता

आज यहाँ की बदल गई आबो हवा देखिये कितनी
वृद्ध की माफ़िक झुका वो शजर जो जवाँ तक नहीं होता

मूक हैं लाचार हैं जानवर हैं यही जिंदगी इनकी  
ढो रहे हैं  बोझ पर दर्द इनका बयाँ तक नहीं होता 


 ख़्वाब सजाते सदा आसमां पर महल वो बनायेंगे
 दिल की जमीं पर मुहब्बत भरा आशियाँ तक नहीं होता

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रविवार, 16 नवंबर 2014

कुछ क्षणिकाएँ ' औपचारिकता ’



आज तुमने बुलाया तो चली आई  
मगर ये तुम भी जानते हो 
न तुमने बुलाया दिल से न मैं दिल से आई 



अच्छा हुआ जो तुम मेरी महफ़िल में नहीं आये
क्यूंकि तुम अदब से आ नहीं सकते थे
और मैं औपचारिकता निभा नहीं सकती थी


आयोजन में कस के गले मिले और बोले 
अरे बहुत दिनों बाद मिले हो अच्छा लगा आप से मिलकर
सुनकर हम दोनों के घरों के पड़ोसी गेट हँस पड़े   



 सुबह से भोलू गांधी जी की प्रतिमा को रगड़-रगड़ कर साफ़ रहा है
 परिंदे आज बहुत  खुश हैं
 चलो कम से कम एक साल में तो उनका शौचालय साफ़ होता है



गंगा खुश है आज उसे गुदगुदी हो रही है वो हँस रही है   
शायद कोई गंगा दिवस भी घोषित हो जाए
और वो भी एक औपचारिकता के अध्याय में जुड़ जाए. 

  


बुधवार, 5 नवंबर 2014

दो घनाक्षरी

क्षमता से भारी-भरकम लेके सवारियाँ, खड़ी हुई स्टेशन पे लोहपथगामिनी
डिब्बों में मारामारी ठूँस-ठूँस भरके चली,भीड़ से बेहाल करे भोर हो या यामिनी
सीट नहीं मिले कोई छत पे छलांग रही ,बड़ी है निडर लाल साड़ी वाली कामिनी
दूजे बाजू उसका लाल डिब्बों का अंतराल,बनी डोर ममता की द्रुत 
गति दामिनी


रेलवे विधान वही बढती आबादी रही,यही तो विडंबना है भारत महान की
एक ओर मजबूरी दूजी ओर धोखाधड़ी , छत पे सफ़र करें चिंता नहीं जान की
लेना न टिकट चाहें चोरी से जुगाड़ करें,कहाँ इन्हें परवाह है मान सम्मान की

प्रशासन सुधार करे  रेलवे विधान में, ध्वजा तब  बुलंद हो मेरे हिन्दुस्तान की
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