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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

जलती रही विभावरी

तिल-तिल जलती रही विभावरी 
लावा द्रगों से बहता रहा, 
बदन को नोचती रही मजबूरियां 
चिन्दा चिन्दा कलेजा फटता रहा !
शुष्क हुआ क्षीर का सोता, 
भूख से शिशु रोता रहा!
मरता रहा कोख में स्त्रीत्व, 
पुरुषत्व दंभ भरता रहा !
लुटती रही अस्मतें, 
विधाता मूक दर्शक बनता रहा! 
गरीबी चीरहरण करती रही, 
दूर खड़ा जमाना हंसता रहा ! 

36 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक ....गहन अभिव्यक्ति ....सोच में डूब गया मन ...

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  2. उफ़ …………भयावह सच्चाई की सटीक अभिव्यक्ति।

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  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  4. अंतत : नारी को अनेकों तरीके से प्रताड़ित होना पड़ता है .
    मार्मिक प्रस्तुति .

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  5. आज की कड़वी सच्चाई को बयान कर रही है ये ... आक्रोश की अभिव्यक्ति है ...

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  6. बहुत ही सुन्दर संवेदनशील रचना
    सादर बधाई....

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  7. विधाता मूक दर्शक बनता रहा!

    क्या वास्तव में विधाता मूक दर्शक बना रहता है,राजेश जी ?

    या हमारे ही कर्मों और सोच का परिणाम है सब.

    अति सुन्दर संवेदनशील प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई.

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  8. बहुत दर्द भरी रचना ....सच का आईना ..........आभार

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  9. बहुत सार्थक व सशक्त रचना, आभार !

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  10. शुष्क हुआ क्षीर का सोता,
    भूख से शिशु रोता रहा!
    मरता रहा कोख में स्त्रीत्व,
    पुरुषत्व दंभ भरता रहा !
    सटीक पंक्तियाँ! गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ मार्मिक रचना!

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  11. जलती रही विभावरी , वाह क्या शानदार रचना है.

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  12. बहुत मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति...

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  13. बहुत सुन्दर और बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति!...

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  14. Very touching creation !....A bitter fact is revealed beautifully.

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  15. कड़वे सच को उजागर करती मार्मिक रचना.

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  16. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 11-11-2011 को शुक्रवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  17. खूबसूरत से मर्माहत करने वाली विडंबना को प्रस्तुत किया है...

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  18. गरीबी चीरहरण करती रही,
    दूर खड़ा जमाना हंसता रहा !

    बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति.

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  19. तिल-तिल जलती रही विभावरी
    लावा द्रगों से बहता रहा,
    बदन को नोचती रही मजबूरियां
    चिन्दा चिन्दा कलेजा फटता रहा !... aah !

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  20. बहुत बहुत सुदर कविता ... एक दर्द जबरदस्त एक छिपी सच्चाई ...

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