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शनिवार, 19 नवंबर 2011

भोर

(my photography)
शरमा गई चांदनी, देखकर रवि को झील में नहाते हुए, 
छुपा लिया चंदा ने मुखड़ा जब देखा किरणों को आते हुए

नीड़ों से बाहर आये खगचर मस्ती में चहचहाते हुए,  
नारंगी लाली संग उलझे मछुआरे जाल बिछाते हुए !
झील के उर में उठे हिलौरे जब हंस चले बलखाते हुए, 
नाव को खेता जाए खिवैय्या  भोर का गाना गाते हुए! 

21 टिप्‍पणियां:

  1. भोर का सुंदर गीत और मनोरम दृश्य!

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  3. भोर की बेला सुहानी ....
    नदिया के तीरे ...
    बहुत मन भावन विवरण ..

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  4. वाह ..बहुत ही खूबसूरत वर्णन

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  5. बहुत खूबसूरत भोर के दर्शन हुए ... रवि को नहाते हुए अच्छा बिम्ब है

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  6. झील के उर में उठे हिलौरे जब हंस चले बलखाते हुए,
    नाव को खेता जाए खिवैय्या भोर का गाना गाते हुए!
    prakriti ka sundar varnan

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  7. बेहद ख़ूबसूरत और शानदार रचना ! दिल को छू गई हर एक पंक्तियाँ!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  8. कल 22/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. भोर की मनोरम प्रस्तुति..बधाई ...
    मेरे नए पोस्ट आएं स्वागत है

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  10. वाह , क्या समां बांधा है ।
    बहुत बढ़िया ।

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  11. सवेरे का विहंगम दृश्य...

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  12. मनमोहक चित्र और रचना....
    सादर....

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  13. बहुत खूब ...कल्पनाओं के मोतियों को
    खूबसूरती से पिरोया है आपने

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  14. सुंदर चित्र और सुंदर कविता
    बधाई

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