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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

मिलन का इन्द्रधनुष

कुछ लम्हों के लिए तेरा आना ,
मेरे पास ठिठक कर रुक जाना 
और मुस्कुरा कर चले जाना 
भला लगा था !
तुम्हारा पुनः आना 
और मेरे पास चुपचाप बैठ जाना 
वो सानिध्य सुखकर लगा था !
तुम्हारे चेहरे के बदलते रंग 
मैंने महसूस किये ,
तुम्हारे माथे की शिकन 
को खुलते देखा ,
अधरों पर हलकी सी मुस्कान को 
आते जाते देखा !
न जाने कब तुम्हारे नयनो 
के निश्छल प्यार की कलम ने 
मेरे हर्दय के कागज़ पर 
प्रेम कहानी लिखनी शुरू कर दी !
अब मेरे इन्तजार का सिलसिला बढ़ने लगा 
और तुम्हारा मेरे पास ठहरने का वक़्त भी !
पर तुम्हारा   मूक ,अपलक मुझे देखते रहना 
मुझे मन मंथन के लिए अग्रसित करता था 
कुछ तो था मुझमे जो तुम रोज मेरे पास
 खिचे चले आते थे ,फिर कुछ कहते क्यूँ नहीं !
प्रत्यक्ष को प्रमाण भी चाहिए ,
मैं   तो पहले ही तुम्हारे प्रतिबिम्ब को 
अपने ह्रदय में समां चुकी थी !
धीरे धीरे चंद्रमा को तुम अपने हाथों से 
ढांपने लगे 
शायद तुम डाह करने लगे थे 
उसकी किरने  जो मुझे चूमती थी 
पवन ने शरारत से मेरी जुल्फों 
को छुआ ,तो तुम्हारे चेहरे की रंगत  ही बदल गई !
तुम मेरे पास बैठ कर मखमली घास में 
ऐसे आड़ी तिरछी रेखाएं खींचते 
मानो आने वाले तूफ़ान को जकड़ने 
के लिए चक्रव्यूह रच रहे हों !
पर आज अचानक शांत झील में ये हलचल क्यूँ 
लगता है मुझसे भी छुपकर 
तुमने मेरे बदन को हौले से स्पर्श किया 
और तुम्हारे  होठों से अनायास ही 
मुखरित हुए ये चिरप्रतीक्षित शब्द 
तुम  मेरी हो !
एहसास हुआ आज आसमान झुक गया 
मेरा सर तुम्हारे काँधे पर था, 
पर मेरा दिमाग आने वाले भूकंप को साक्षात 
देख रहा था !
तुम्हारे मौन का अर्थ अब मैं समझ रही थी, 
क़ि क्या  कभी अम्बर और धरा का मिलन हो सकता है 
क्या ये पग पग में बिछे ज्वालामुखी
उच्च और निम्न ,श्याम और श्वेत 
लोह और स्वर्ण के मिलन का 
इन्द्रधनुष बनने देंगे कभी ??
और न जाने कब मेरी पलकों 
का सावन तुम्हे भिगो गया !         
*****


      
  

41 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ……………क्या खूब प्रेम का इंद्रधनुष खींचा है्……… उहापोह की स्थिति और प्रेम …………एक बहुत सुन्दर चित्रण।

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  2. लाजवाब रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  3. क्या कभी अम्बर और धरा का मिलन हो सकता है
    क्या ये पग पग में बिछे ज्वालामुखी
    उच्च और निम्न ,श्याम और श्वेत
    लोह और स्वर्ण के मिलन का
    इन्द्रधनुष बनने देंगे कभी ??
    और न जाने कब मेरी पलकों
    का सावन तुम्हे भिगो गया !
    *****bahut kuch kahti panktiyaan

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर भावप्रणव प्रस्तुति।

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  5. खूब प्रेम का इंद्रधनुष है्.

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  6. बहुत अच्छे से अच्छे भावों को अपने शब्दबद्ध किया है !

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  7. पंक्तियाँ सहज ही कितना गहरापन उड़ेल गयीं।

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  8. उद्दात अभिव्यक्ति प्रेम की.

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  9. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 07-11-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  10. ह्रदय सुनना चाह रहा था जो आहटें , वह मुखरित हुई तो भयभीत हुए ...
    प्रेम और भय के एहसासों की सुन्दर रचना !

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  11. वाह -वाह कहने के सिवा मेरे पास और कुछ भी तो नहीं ......शुक्रिया जी /

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  12. लोह और स्वर्ण के मिलन का
    इन्द्रधनुष बनने देंगे कभी ??
    और न जाने कब मेरी पलकों
    का सावन तुम्हे भिगो गया !

    आत्मा से निकले भाव और शब्द कविता को बेहद प्रभावशाली बना रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  13. और ना जाने कब मेरी पलकों का सावन तुम्हें भीगा गया.

    बहुत सुंदर और भावपूर्ण प्रस्तुति. बहुत हि प्रभावशाली. बधाई.

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  14. आपकी उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  15. तुम मेरे पास बैठ कर मखमली घास में
    ऐसे आड़ी तिरछी रेखाएं खींचते
    मानो आने वाले तूफ़ान को जकड़ने
    के लिए चक्रव्यूह रच रहे हों !

    पूरी कविता सुन्दर भाव/शब्द संयोजन का उदाहरण बन गई है...
    बहुत सुन्दर... सादर....

    उत्तर देंहटाएं
  16. लोह और स्वर्ण के मिलन का
    इन्द्रधनुष बनने देंगे कभी ??
    और न जाने कब मेरी पलकों
    का सावन तुम्हे भिगो गया !

    Awesome !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  17. man ke bhavon ko badi sundarta se chitrit kiya hai aap ne
    badhaai sweekar karen

    उत्तर देंहटाएं
  18. कविता का शीर्षक, तस्वीर और हर एक पंक्तियाँ बेहद ख़ूबसूरत लगा! लाजवाब रचना!

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  19. prem main doobi bhavnaon se bhari bahut hi anupam rachanaa .bahut badhaai aapko.
    मुझे ये बताते हुए बड़ी ख़ुशी हो रही है , की आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (१६)के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप हिंदी की सेवा इसी तरह करते रहें यही कामना है /आपका
    ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर स्वागत है /आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए / जरुर पधारें /

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  20. आदरणीय महोदया
    प्रेम की उपासक अमृता जी का हौज खास वाला घर बिक गया है। कोई भी जरूरत सांस्कृतिक विरासत से बडी नहीं हो सकती। इसलिये अमृताजी के नाम पर चलने वाली अनेक संस्थाओं तथा इनसे जुडे तथाकथित साहित्यिक लोगों से उम्मीद करूँगा कि वे आगे आकर हौज खास की उस जगह पर बनने वाली बहु मंजिली इमारत का एक तल अमृताजी को समर्पित करते हुये उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिये कोई अभियान अवश्य चलायें। पहली पहल करते हुये भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित अपने पत्र की प्रति आपको भेज रहा हूँ । उचित होगा कि आप एवं अन्य साहित्यप्रेमी भी इसी प्रकार के मेल भेजे । अवश्य कुछ न कुछ अवश्य होगा इसी शुभकामना के साथ महामहिम का लिंक है
    भवदीय
    (अशोक कुमार शुक्ला)

    महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!

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  21. बहुत खूब... भावों की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति.. ..........बहुत ही सधे हुए शब्दों में आपने रचना को लिखा है .

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  22. कृपया पधारें व अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराएँ !

    http://poetry-kavita.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html

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  23. लोह और स्वर्ण के मिलन का
    इन्द्रधनुष बनने देगे कभी...
    बहुत खूबसूरत रचना लिखी आपने .... बधाई
    मेरे नई पोस्ट पर आप का स्वागत है |

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  24. क़ि क्या कभी अम्बर और धरा का मिलन हो सकता है
    क्या ये पग पग में बिछे ज्वालामुखी
    उच्च और निम्न ,श्याम और श्वेत
    लोह और स्वर्ण के मिलन का
    इन्द्रधनुष बनने देंगे कभी ??
    और न जाने कब मेरी पलकों
    का सावन तुम्हे भिगो गया !
    वाह !!!! इंद्र धनुषी रंगों को यथार्थ के प्रिज़्म से देखा है

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  25. बहुत ही भाव पूर्ण ... उनका आ जाना ही बहुत होता है ...

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  26. न मिल सकने वाले प्रेम की अभिव्यक्ति बिल्कुल ऐसी ही होती होगी....मर्मस्पर्शी...

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