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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

क्यूँ बुरा लगा ?

जब देदी तुमने दियासलाई फिर उन्होंने आग लगाई 
क्यूँ बुरा लगा ?
बिखरा दिए जब बीज गरल के ,फिर जहरीली फसल उग आई 
क्यूँ बुरा लगा ?
जब चोरो को देदी चौकी ,उसी में उन्होंने  सेंध लगाई 
क्यूँ बुरा लगा ?
जब भ्रष्ट हाथों में देदी कुर्सी ,उन्होंने देश की जड़े हिलाई 
क्यूँ बुरा लगा ?
भरते रहे विदेशी गुल्लक ,फिर महंगाई की महामारी आई 
क्यूँ बुरा लगा ?      

20 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े ही सहज प्रश्न हैं, उत्तर समेटे हुये।

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  2. बहुत सही ...
    किया है तो भरना भी पड़ेगा भाई....

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  3. व्यंग्य के साथ सच्चाई दर्शाती रचना ।
    बहुत खूब !

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  4. बहुत गहरे भाव लिए सुन्दर रचना ।

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  5. बहुत सटीक कथन...सुन्दर प्रस्तुति..

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  6. जब हम अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं तो बुरा लगने का प्रश्न ही नहीं होता...

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  8. खुद ही अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी तो क्यों बुरा लगा ..सही बात कही है ....अच्छी प्रस्तुति

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  9. सही कहा , बुरा नहीं लगना चाहिए !

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  10. तीखे प्रश्न उठाए हैं ... और सच ही कहा है ... इन सब बातों का ध्यान शुरू में ही रखना चाहिए ...

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  11. सटीक और सारगर्भित प्रश्न्।

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  12. नही बुरा नही लगा अब तक तो झेले ही जा रहे हैं...|
    बहुत ही सही सवाल किया है आपने इन पंक्तियों के माध्यम से|
    क्या बुरा लगा?

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  13. सब हमारा ही किया धरा है बुरा मान कर क्या ले लेंगे .
    आभार मेरे ब्लोग पर आ कर टिप्पणी देने के लिये, सनेह बना कर रखे .

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  14. सटीक और सारगर्भित प्रश्न् उठाया है.आभार...

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