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बुधवार, 11 मई 2011

जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया

निष्ठुर हाथों ने बचपन छुड़ाया
जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया !

अभी खिसकना सीखा था 
वक़्त ने कैसे बड़ा किया 
कुछ कठोर सच्चाई ने 
कुछ प्राकर्तिक गहराई ने 
कुछ पिघलते भावों ने 
कुछ सिसकते घावों ने 
कुछ टूटती कसमों ने 
कुछ खोखली रस्मों ने 
कुछ बेमानी बातों ने 
कुछ अपनों की घातों ने 
कुछ संमाज की दोहरी चालों ने 
कुछ दोगली फितरत वालों ने 
समय से पहले बड़ा किया 
अभी खिसकना सीखा था 
वक़्त ने कैसे खड़ा किया!! 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

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  2. इन्हीं कठिन हालातों से गुज़रते हुए हम कब बड़े हो जाते हैं और बचपन पीछे छूट जाता है , पता ही नहीं चलता। शायद ज़िन्दगी इसी तरह हमें बड़े-बड़े पाठ भी सिखा देती है।

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी आज के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. बचपन-बुढ़ापा और जवानी जीवन के अंग हैं!
    मगर सबसे ज्याद बचपन ही याद आता है!
    --
    बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति दी है आपने!

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