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सोमवार, 30 सितंबर 2013

नव ब्रह्मांड

छंदत्रिभंगी
जोड़ो   चार  हाथ ,अब एक साथ , नव ब्रह्मांड उठा लाओ
रख अडिग विश्वास ,अविरल प्रयासभूमंडल पर छा जाओ
कल धरा सँवारे  हाथ तुम्हारे , ,मन में प्रण कर जाओ
जो देश बांटती ,धरा काटतीवो दीवारें   ढा जाओ

दुर्मिल सवैया
दस हाथ जहां जुड़ते मन से ,ब्रह्माण्ड वहीँ झुकता बल से
धुन ख़ास रहती  मन में ,हर काम वहीँ  सधता  हल  से
अवधान बिना अभिप्राय  बिना , कुछ जीत नहीं सकता छल से
सहयोग बिना सदभाव  बिना , खुद  नीर नहीं उठता तल से
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13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति है |
    शुभकामनायें दीदी-

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  2. बहुत प्रभावी रचनाएँ .....शुभकामनायें ....

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  3. बहुत बढिया.प्रस्तुति ...शुभकामनायें ....

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  4. दस हाथ जहां जुड़ते मन से ,ब्रह्माण्ड वहीँ झुकता बल से
    .
    एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना
    सुंदर सृजन !
    बचपन

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  5. मिल के कार्य किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है ...
    सुन्दर प्रस्तुति ...

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  6. आदरणीया राजेश कुमारी जी बहुत सुन्दर छंद ..भाव प्रबल ..जोश दे जाती है ये रचनाएं
    भ्रमर ५

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  7. सहयोग बिना सदभाव बिना , खुद नीर नहीं उठता तल से

    ...वाह! बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

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  8. अवधान बिना अभिप्राय बिना , कुछ जीत नहीं सकता छल से

    वाह ...
    प्रभावशाली कलम है आपकी !
    बधाई !

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