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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

ऐ जान जरा बात बताओ तो सही

दीवार तग़ाफुल  की  ये ढाओ  तो सही
इक बाँध रिफ़ाकत का बनाओ तो सही

 पाक मुहब्बत में मिटा दें सरहदें
  इस ओर  जरा हाथ बढ़ाओ  तो सही 

हैरान परेशान खड़े हो इस कदर 
ऐ- जान जरा बात बताओ तो सही 

मैं पार तेरे नाम से कर जाऊं तपिश 
सैलाब- ए- अंगार बहाओ तो सही

वीरान निगाहों  में तेरी लिख दूँ ग़ज़ल
अशआर  गुरेज़त  के सुनाओ तो सही

तामीर करूँ ताज़महल तेरे लिए
इक नींव तकारुब की बिछाओ तो सही

मैं राज़  छुपा  दिल में ही रख लूँगी सदा
पर्दा –ए- हकीक़त को  उठाओ तो सही

**********************************
तगाफ़ुल  =उपेक्षा 
रिफ़ाकतदोस्ती.
गुरेज़त= विरक्ति
तकारुब= समीपता
तामीर =निर्माण

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह पोस्ट आज के (०६ सितम्बर , २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - यादें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  2. इस ओर जरा हाथ बढ़ाओ तो सही

    क्या बात है राजेश जी !!
    बधाई !

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  3. वाह... बेहद खुबसूरत ग़ज़ल...

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  4. "नादान परिंदे ब्लॉगर" - हिंदी का एक नया ब्लॉग संकलक" पर अपनी उपस्तिथि दर्ज कराकर हमे इसे सफल ब्लॉगर बनाने में हमारी मदद करें। अपने ब्लॉग को जोड़ें एवं अपने सुझाव हमे बताएं

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  5. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (08-09-2013) के चर्चा मंच -1362 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

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  7. वाह ..
    बेहतरीन रचना...
    अति उत्तम...
    :-)

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  8. वीरान निगाहों में तेरी लिख दूँ ग़ज़ल
    अशआर गुरेज़त के सुनाओ तो सही,,,

    वाह वाह !!! बहुत सुंदर गजल ,,,

    RECENT POST : समझ में आया बापू .

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  9. वाह ... खूबसूरत गज़ल है ... लाजवाब शेर ...

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