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रविवार, 1 सितंबर 2013

कटु सच्चाई (छंद मुक्तक)

खूँटी पर लटका दिया ,भीतर नहीं प्रकाश 
पर मेरे तुम काट कर ,निगल गए आकाश 
आँखों में बरसात है ,मौसम भी है सर्द 
देख गगन को हो रहा ,इन पांखों  में दर्द   

तिल-तिल घिसकर गात,जो सप्त  वाहन ठेला
जल बिन   बिन वात,वो निपट खड़ा अकेला
खुशियों की नहीं हाट ,दर्द भरा यहाँ  मेला 
क्यों होता हैरान, यही जीवन का  खेला  


हुआ कहाँ कब बेसुरा ,रिश्तों का संगीत। 
उठते-उठते कब उठी , भीतरभीतर भीत   
झूठे हैं रिश्ते यहाँ ,झूठी दिल की प्रीत

हे मानव समझा रही ,कलयुग की ये रीत ||

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर भाव-
    बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार दीदी

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  2. बहुत सुन्दर भावमय मुक्तक ...
    आनंद आ गया ...

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  3. हुआ कहाँ कब बेसुरा
    ,रिश्तों का संगीत।
    उठते-उठते कब उठी ,
    भीतर- भीतर भीत ॥

    बहुत सुंदर !

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  4. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (03-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  5. सुन्दर प्रस्तुति ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (03-09-2013) को "उपासना में वासना" (चर्चा मंचःअंक-1358) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. वाह बहुत ही सुन्दर भावों को उकेरा है आपने ..

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  7. बहुत ही अच्छी और सार्थक पंक्तियाँ

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