यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

मैं मूढ़ मति

 पग- पग पे समझाया उसने 
मैं आगे कदम बढ़ाती रही, 
जिन राहों पर रोका उसने 
मैं उन राहों पर जाती रही !
पतन खड़ा तेरी चौखट पे 
मैं जीत का जश्न मनाती रही, 
गलत है ये टोका उसने 
मैं धूल की तरह उड़ाती रही!
हरसूं मैं तुझको देख रहा 
मैं अट्टाहस कर झुठलाती रही 
औंधे मुंह गिर जाओगी 
मैं खुल के पेंग बढ़ाती रही !
जब खिसक गई पैरों से जमीं
मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही ! 

  

27 टिप्‍पणियां:

  1. कभी कभी ऐसा ही होता है की किसी की बात नहीं सुनी जाती और जब दर्द मिलता है तो किस्मत को ही दोषी मान लिया जाता है ..

    उत्तर देंहटाएं
  2. काफी गहरी अभिव्यक्ति है ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खुबशुरत अच्छी रचना आखिरी की ४ पन्तियाँ में रचना का सार है
    सुंदर पोस्ट ....के लिए बधाई....
    मेरी नई पोस्ट के लिए -काव्यान्जलि- मे click करे

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब खिसक गई पैरों से जमीं
    मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही !...nahi manne per yahi haal hota hai

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवन का कटु सत्य है.... जिससे आपने अवगत कराया है....

    उत्तर देंहटाएं
  6. जब खिसक गई पैरों से जमीं
    मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही !

    ....जीवन का एक कटु सत्य जिसे हम जानबूझ कर झुठलाते रहते हैं...बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  7. जब खिसक गई पैरों से जमीं
    मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही !
    समय पर संभल जाने बेहतर कुछ नहीं.... सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपने बहुत ही सुन्दर गीत रचा है !
    जीवन के सत्य को उजागर करती बढ़िया रचना.
    बधाई हो

    उत्तर देंहटाएं
  9. main jindagi dhuyein mein udata chala gay...jashn manata chala gaya...lekin ye acchi baat nahi hai..kismat par dosh lagaane se koi fayda nahi...behtari prastuti..mere blog par aap sadar amantrit hain

    उत्तर देंहटाएं
  10. ha ye bat to sach haikoi hame sahi marg dikhata hai,, par ham apni dhunki me itane mast rahate hai ki bat nahi manate or kam bigad jane par nasib ,kismat ko dosh lagate hai...
    is baat ko apne bakhubi se apni kavita me vyakt kiya hai
    ati uttam rachana hai...

    उत्तर देंहटाएं
  11. ्सच कहा ………गलतियो के लिये हम खुद जिम्मेदार होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. मूर्च्छा और जागरण के बीच यही फर्क है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. पतन खड़ा तेरी चौखट पे
    मैं जीत का जश्न मनाती रही,
    गलत है ये टोका उसने
    मैं धूल की तरह उड़ाती रही!
    bahut achchi rachna...
    welcome to my blog :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. मनुष्य प्रगति के मद में यूँ ही बढ़ता जाता है पर जिंदगी जब आईना दिखाती है तो उस विराट के आगे अपनी हस्ती का आभास ऐसा ही होता है जैसा आपने लिखा

    उत्तर देंहटाएं
  15. वाह...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

    उत्तर देंहटाएं
  16. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ उम्दा रचना लिखा है आपने !

    उत्तर देंहटाएं
  17. galat baat ke liye kisi ka tokna kai baar bardaasht nahin hota, aur jab khaamiyaja bhugatata hai to kismat ka dosh...aise hin hain hum sabhi. achchhi rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  18. जिन राहों पर रोका उसने
    मैं उन राहों पर जाती रही !
    जीवन के सत्य को उजागर करती रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  19. सही कहा आप ने राजेश जी. ..गहन अनुभूति लिए सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  20. Our inner voice always guides us. Quite realistic creation.

    उत्तर देंहटाएं
  21. शानदार और प्रभावी प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  22. होता सबके साथ है जो आपने महसूस किया... सुन्दर प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  23. bahut achcha likha aapne rajesh jee.aapki sari baton se sahmat hun.

    उत्तर देंहटाएं