पग- पग पे समझाया उसने
मैं आगे कदम बढ़ाती रही,
जिन राहों पर रोका उसने
मैं उन राहों पर जाती रही !
पतन खड़ा तेरी चौखट पे
मैं जीत का जश्न मनाती रही,
गलत है ये टोका उसने
मैं धूल की तरह उड़ाती रही!
हरसूं मैं तुझको देख रहा
मैं अट्टाहस कर झुठलाती रही
औंधे मुंह गिर जाओगी
मैं खुल के पेंग बढ़ाती रही !
जब खिसक गई पैरों से जमीं
मैं मूढ़ मति किस्मत पे दोष लगाती रही !
