यह ब्लॉग खोजें

सोमवार, 4 नवंबर 2013

हमारे पर्व


हमारे पर्व
शुभ हो धनतेरस तुम्हें ,स्वर्ण कलष लो तोल|
मैं बांटू रस छंद ये ,बिना भाव  बिन मोल||

पाओ तुम सम्पन्नता ,पर दुःख ग्रंथि  खोल|
 प्रणय  भाव से ही खुलें ,खुशियों के सब झोल||

झिल-मिल दीपक अवलियाँ, अंतर भरें उजास। 
दूर करें दुर्भावना , भरती  सरस मिठास ॥

गोवर्धन में पूजते ,गौ माता को लोग| 
जिसके मीठे दुग्ध से, बनते छप्पन भोग||


प्यारा बहनों को बहुत,भ्रात दूज का पर्व| 
बहनों के इस स्नेह पर ,भाई करते गर्व||
*******************************

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... अच्छे हैं रस छंद....

    उत्तर देंहटाएं
  2. सारे पर्वों की आपको भी मंगल कामनाएं..सुंदर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सबको ही त्योहार की ढेरों शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सभी पर्वों का लेखाजोखा .... बहुत उत्तम ...
    ढेरों शुभकामनायें ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह !पुरे पांच दिनों के सभी त्योहार का सुन्दर चित्रण |
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !
    नई पोस्ट आओ हम दीवाली मनाएं!

    उत्तर देंहटाएं