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सोमवार, 18 नवंबर 2013

मेरा बचपन मेरा गाँव (दोहा गीत )




सुबह शाम को मंदिरों, में मन्त्रों का जाप
सांझ ढले जब दूर से, सुनें ढोल की थाप| 
कानों में जब भोर में,पड़े ग्वाल का गान
सांझ ढले चौपाल पर,वो आल्हा की तान| 
पीपल की वो गाँव में, ठंडी- ठंडी छाँव|
आँगन की मुंडेर पे , कौओं की वो काँव||  
निरंतर ट्यूबवैल से ,पानी की भक भाक
धान कूटते हाथ से ,मूसल की ठक- ठाक|| 
छत पे तारे देखते ,गिनते मिलकर सा
सर्दी में चूल्हे निकट , रहें सेंकते हाथ||  
मक्के की वो रोटियां ,औ सरसों का साग|
कोल्हू का वो गुड़ गरम , गन्ने का वो झाग|| 
अब तक भी भूले नहीं, आते हमको याद
गाँवों को मत छोड़ना ,सुनो सभी फ़रियाद||

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया गांव का सुंदर चित्रण ......

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  2. बहुत सुन्दर चित्रण अब ऐसे गाँव भी नहीं रह गए .. शहरीकरण लिब्रलाइजेशन सब लील रहा है ..

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  3. ग्रामीण परिवेश का बहुत सुंदर चित्रण.
    नई पोस्ट : मेघ का मौसम झुका है

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  4. अब तक भी भूले नहीं, आते हमको याद
    गाँवों को मत छोड़ना ,सुनो सभी फ़रियाद ...

    लाजवाब दोहे ... अपने घर, गाँव की याद दिला दी ...

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  5. मक्के की वो रोटियां ,औ सरसों का साग|
    कोल्हू का वो गुड़ गरम , गन्ने का वो झाग||

    कोल्हू का वो गुड़ गर्म रसगन्ने का झाग।

    सुन्दर परिवेश रचा है दोहावली में।

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  6. वाह राजेश जी पूरा एक गाँव खड़ा कर दिया मानसपटल पर ...बहोत ही सुन्दर चित्रण ...सजीव ...सुन्दर...सरस ....!!!!

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  7. बहुत खूब !खूबसूरत रचना,। सुन्दर एहसास .
    शुभकामनाएं.

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