यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 24 जून 2010

तू काहे निकली बाहर डगरिया गीली थी

It's a  rainy season I am thinking to write some thing related to this season.I open my old diary and found a poetry which I had written quite long back I thik in 1995 i had written this.I had tried to write this in bhojpuri language.I m posting here it is...
तू काहे निकली बाहर डगरिया गीली थी
उमड़ घुमड़ मेह बरसे बिजुरिया भड़कीली थी!
तन भीगा पग फिसला
मटमैली भई चुनरिया जो पीली थी

चूड़ी चटकी फूटी मटकी
छिटक गई पैजनिया जो ढीली थी
खिल खिल हँसे ननदिया
भ्रकुटी मटकाए सास बड़ी नखरीली थी

तन सिमट गया सजन संग लिपट गया 
छुई मुई भई बहुरिया बड़ी शर्मीली थी 
आँचल ढलका घूंघट पलटा
बरस गई अँखियाँ जो कजरीली थी!!

1 टिप्पणी:

  1. तू काहे निकली बाहर डगरिया गीली थी
    उमड़ घुमड़ मेह बरसे बिजुरिया भड़कीली थी!
    तन भीगा पग फिसला
    मटमैली भई चुनरिया जो पीली थी ....
    बहुत ही बढ़िया कविता लिखी है आपने...फिल्म की तरह पूरा चित्र सामने आ गया...बधाई...

    उत्तर देंहटाएं