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गुरुवार, 25 सितंबर 2014
शुक्रवार, 5 सितंबर 2014
“हेप्पी टीचर्स डे”(संस्मरण)
“हेप्पी टीचर्स डे”(संस्मरण)
सन १९८६ में विशाखापत्तनम नेवल पब्लिक
स्कूल में शिक्षण काल के दौरान का ये वाकया....
छठी कक्षा का सबसे शरारती छात्र आये दिन
कोई न कोई शरारत करना और ढेर सारी डांट खाना|होम वर्क कभी पूरा करके ना लाना क्लास
में दूसरे पढ़ते हुए छात्रों को भी
डिस्टर्ब करना मानो उसकी आदत ही बन गई थी|बहुत बार दंड देकर दुःख भी होता
था,किन्तु वो था कि सुधरने का नाम ही नहीं लेता था|माँ बाप भी आकर मुझे बोलते थे
की मैडम आप ही इसे सुधार सकती हो|उस दिन तो हद ही हो गई जब वो मेरी हिदायतों को
रिपीट करने लगा अर्थात मेरी ही नक़ल उतारने लगा| पहली बार मेरी क्रोध की सीमा टूट गई मेरा हाथ उस पर उठामगर वो
मुस्कुराता रहा| अगले दिन शिक्षक दिवस था सब बच्चे फूल भेंट कर रहे थे|फिर वो लड़का
आया कुछ झिझकते हुए उसने अपनी शर्ट के नीचे पहने बनियान की पाकेट से एक बर्फी
निकाली और मेरी हथेली पर “हेप्पी टीचर्स डे” कह कर रख दी और मेरी और देखने लगा,न
जाने उसकी आँखों में वो कैसा अनुरोध था कि मैंने
वो बर्फी उसी के सामने खाई उसके प्रति वो सारा क्रोध पल भर में गायब हो गया
उसको आशीर्वाद दिया .उस दिन के बाद से उस बच्चे में अनोखा व्यवस्थित बदलाव देखा.मन
लगा कर पढने लगा, फाइनल में तो उसने सबको चौंका दिया बहुत अच्छी पोजीशन से पास हुआ|
मैं आज तक नहीं समझ सकी कि वो बदलाव उसमे अचानक कैसे आया ,सोचती हूँ की आज भी वो
कहीं मिले तो उससे पूछूँ|जब भी शिक्षक दिवस आता है मुझे वो बच्चा याद आता है|
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मंगलवार, 26 अगस्त 2014
सर्कस एक जिन्दगी (रोला छंद पर आधारित )
सर्कस का संसार ,रहे कायम ये जबतक
अद्भुत कारोबार , चक्र सा चलता तबतक
चलते फिरते गाँव ,शहर कस्बों में जाते
विस्मित होते लोग ,नये करतब दिखलाते
जोखिम में हैं जान ,नहीं पर चिंता इनको
कहाँ करें परवाह ,पेट भरना है जिनको
कलाकार करतार ,करे इनकी रखवाली
करती ऊर्जावान ,इन्हें लोगों की ताली
नित्य करें अभ्यास ,सभी मिलजुल कर रहते
हार मिले तो मार ,जानवर भी हैं सहते
चटख रंग परिधान ,पहनते हैं ये सारे
चका चौंध के बीच ,लगें आखों को प्यारे
चलें डोर पर चार,हवा में ये लहराते
हो ना हो विशवास ,बड़े करतब कर जाते
तन मन का अभ्यास, यंत्र वत इन्हें बनाता
राह सभी आसान ,पाठ बस यही सिखाता
गज़ब संतुलन खेल ,रचाता देखो पहिया
रोटी की दरकार, कराती ता ता थैय्या
अपने गम को भूल ,हँसाता खुशियाँ बोकर
सर्कस की है जान ,मस्त रंगीला जोकर
जिन्दा है प्राचीन ,कला जो ये हैरत की
इसमें है आयुष्य ,पुरा संस्कृति भारत की
सर्कस के ये खेल ,हुए अब देखो सीमित
जर्मन औ यूरोप ,इन्हें बस रखते जीवित
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गुरुवार, 21 अगस्त 2014
राखी (लघु कथा )
“भाभी अगर कल तक मेरी राखी की पोस्ट आप तक नहीं पँहुची तो परसों मैं आपके यहाँ
आ रही हूँ भैया से कह देना ” कह कर रीना
ने फोन रख दिया|
अगले दिन भाभी ने सुबह ११
बजे ही फोन करके कहा ‘रीना राखीपँहुच गई हैं” पर भाभी मैंने तो इस बार राखी पोस्ट ही नहीं की थी!!! ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
रविवार, 10 अगस्त 2014
रक्षाबंधन विशेष (माहिया विधा पर आधारित)
ऋतु बड़ी सुहानी है
घर आ जा बहना
राखी बँधवानी है ||
घर आ जा बहना
राखी बँधवानी है ||
अम्बर पे बदरी है
भैया आ जाओ
तरसे मन गगरी है |
भैया आ जाओ
तरसे मन गगरी है |
बहना अब दूरी है
कैसे आऊँ मैं
मेरी मजबूरी है ||
कैसे आऊँ मैं
मेरी मजबूरी है ||
कोई मजबूरी ना
आ न सको भैया
इतनी भी दूरी ना ||
आ न सको भैया
इतनी भी दूरी ना ||
नखरे थे वो झूठे
मैं आ जाऊँगा
बहना तू क्यूँ रूठे |
मैं आ जाऊँगा
बहना तू क्यूँ रूठे |
परदेश बसी बहना
रक्षा बंधन है
बस तेरा खुश रहना |
रक्षा बंधन है
बस तेरा खुश रहना |
चंदा भी मुस्काया
राखी बँधवाने
प्यारा भैया आया ||
राखी बँधवाने
प्यारा भैया आया ||
पूजा की थाली है
हल्दी का टीका
राखी नग वाली है ||
हल्दी का टीका
राखी नग वाली है ||
राखी तो बांधेगी
मुँह करके मीठा
तू नेग भी मांगेगी ||
मुँह करके मीठा
तू नेग भी मांगेगी ||
आगे कलाई करो
नेग न मांगू मैं
बस सिर पे हाथ धरो||
नेग न मांगू मैं
बस सिर पे हाथ धरो||
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बुधवार, 30 जुलाई 2014
वो पीपल का पेड़ (गीतिका छंद)
वृक्ष पीपल का खड़ा है, आज भी उस गाँव में
बचपना मैंने गुजारा, था उसी की छाँव में
तीज में झूला झुलाती,गुदगुदाती
मस्तियाँ
गीत सावन के सुनाती ,सरसराती पत्तियाँ
गुह्य पुष्पक दिव्य अक्षय,प्लक्ष इसके नाम हैं
मूल में इसके सुशोभित, देवता के धाम हैं
स्वास्थ वर्धक ,व्याधि रोधक,बूटियों की खान है
पूजते हैं लोग इसको ,शुद्ध संस्कृति वान
है
गाँव का इतिहास उसकी ,तंत्रिकाओं में रमा
मूल में उसकी किसानों,का पसीना है जमा
गाँव की पंचायते ,चौपाल भी जमती वहाँ
गर्मियों की चिलचिलाती धूप भी थमती वहाँ
चेतना की ग्रंथियों को, आज भी वो खोलता
झुर्रियों में आज उसका, आत्मदर्पण बोलता
शाख पर जिसके लटकती ,आस्था की हांडियाँ
झुरझुरी वो ले रही हैं,देख अब कुल्हाड़ियाँ
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शुक्रवार, 18 जुलाई 2014
झुकी उस डाल में हमको कई चीखें सुनाई दें (ग़ज़ल 'राज')
तुम्हारे पाँव से कुचले हुए गुंचे दुहाई दें
फ़सुर्दा घास की आहें हमें अक्सर सुनाई दें
तुम्हें उस झोंपड़ी में हुस्न का बाज़ार दिखता है
हमें फिरती हुई बेजान सी लाशें दिखाई दें
तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है मजे से तोड़ते कलियाँ
झुकी उस डाल में हमको कई चीखें सुनाई
दें
कहाँ महफ़ूज़ वो माँ दूध से जिसने हमे पाला
झुका देती जबीं अपनी सजाएँ जब कसाई दें
उड़े कैसे भला तितली लगे हैं घात में शातिर
ख़ुदा की रहमतें ही बस उन्हें अब तो रिहाई दें
न कोई दर्द होता है लहू को देख कर तुमको
तुम्हें आती हँसी जब सिसकियाँ भर भर दुहाई दें
करें फ़रियाद कब किससे जहाँ में कौन है किसका
सितम गर रूहें, खुद रब की अदालत में सफ़ाई दें
फ़सुर्दा =मुरझाई हुई
महफ़ूज़ =सुरक्षित
जबीं =माथा
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