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बुधवार, 12 जून 2013

पाखंडी तुम

नस नस  में
टीस रही  दरारे
नैना बरसे
पर नहीं बरसे
पाखंडी तुम
व्यथित चित्त
सीली सीली दीवारें
निशा पिघले
पर नहीं पिघले
पाखंडी तुम
अग्नि समक्ष
भरे  सात वचन
कहाँ बदले
पर  बदल गए
पाखंडी तुम
मैं बनी मीन
रिश्तों की ग्रंथियों
में फंसी रही
केवल  मुक्त हुए
पाखंडी तुम
*********

10 टिप्‍पणियां:

  1. रिश्तों की ग्रंथियों
    में फंसी रही
    केवल मुक्त हुए
    पाखंडी तुम
    - यही होता आया आया है !

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  2. बहुत सटीक अभिव्यक्ति...

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  3. कौन रहे उड़ता उडता सा,
    उसने बाँध लिया सबको ही।

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (14-06-2013) के "मौसम आयेंगें.... मौसम जायेंगें...." (चर्चा मंचःअंक-1275) पर भी होगी!
    सादर...!
    रविकर जी अभी व्यस्त हैं, इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. गहन भाव लिए काफी सुन्दर
    साभार !

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