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बुधवार, 11 जून 2014

अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती (कुडंली छंद )

अँखियों से झर रहे,बूँद-बूँद मोती
राधा पग-पग फिरे,विरह बीज बोती
सोच रही काश में ,कान्हा सँग होती
चूम-चूम बाँसुरी,अँसुवन से धोती

मथुरा पँहुच कर सखि,भूले कन्हाई  
वृन्दावन नम हुआ ,पसरी तन्हाई
मुरझाई देखता ,बगिया का माली
तक-तक राह जमुना ,भई बहुत काली

 खग,मृग, अम्बर, धरा,हँसना सब भूलें  
 महुआ जूही  कमल ,टेसू  ना फूलें
 पूछ रही डालियाँ ,कौन संग झूलें   
 निष्ठुर, निष्पंद हिय, उठती हैं हूलें  

कोयलिया डार पर ,कुहुक-कुहुक रोई
बीतें जग-जग दिवस ,रतिया न सोई
बिरही  पगडंडियाँ , शूल- शूल बोई 
 संदेसा भेज दे ,कान्हा  को  कोई    

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10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1641 में दिया गया है
    आभार

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  2. बिरही पगडंडियाँ , शूल- शूल बोई
    संदेसा भेज दे ,कान्हा को कोई

    कितना सुंदर विरह गीत।

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  3. सुंदर छंद बद्ध रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  4. कोयलिया डार पर ,कुहुक-कुहुक रोई
    बीतें जग-जग दिवस ,रतिया न सोई

    bahut sundar bhaav ... abhaar

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...... राजेश जी

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  7. बहुत सुंदर रचना , खूबसूरत भाव !

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