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सोमवार, 2 दिसंबर 2013

लघु कविता - विकलित आखर (चोका विधा पर आधारित)

घुप्प अँधेरा
कुछ नीरव क्षण
सीलते मेघा
टप  टप बरसे 
खुली किताब
विकलित आखर  
इतना भीगे 
तोड़े तटबंधन
हो उत्तेजित 
गहन भँवर में
मिलके  डूबे
लवणित अम्बर 
पिघला सारा
मिलकर सागर
हो गया खारा
कलम ने पीकर
प्यास बुझाई
हिय व्यथा सकल
कागज़ पर आई
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8 टिप्‍पणियां:

  1. बाहर सुन्दर प्रस्तुति ... अच्छा प्रयोग है ...

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  2. बहुत उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

    उत्तर देंहटाएं