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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

सत्य का विलुप्त अस्तित्व

सहस्त्रों झूठ के कर्कश आवरण के नीचे दबा हुआ 
अंतरउर में होने वाले अंतर्द्वंद से जूझता हुआ 
छटपटा रहा हूँ!
गहन अन्धकार से बाहर निकलने को आतुर,
धीरे धीरे रेंगता हुआ द्रगों के पारदर्शी कपाटों के पीछे से 
लाचार बेबसी से झांकता हुआ 
किसी को दिखाई दे जाता हूँ 
फिर अपने बैरी को पस्त हुआ देख अनायास ही मुस्कुरा उठता हूँ ! 
और अपने वजूद को महसूस करने लगता हूँ !
मेरा स्पंदन अबोध बालक में निहित है 
जब मैं उसकी आँखों और मुख से मुखरित होता हूँ !
परन्तु न जाने कब झूठ का नाग अपना फन फैलाकर 
मेरी छाती पर बैठ जाता है और मेरे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है !
मेरी विजय उस दिन होती है
 जब मानव की साँसों की टूटती हुई डोर का अवलंबन लेकर 
अपने अरि का हनन कर प्रकट होता हूँ !
पर मैं भ्रमित हूँ 
मेरे  अरि का कद मुझसे कैसे इतना बड़ा हो गया 
जो मुझे कुचल कर खुली हवा में सांस लेता है ,
और मैं गहन कारागार में बंद होकर सिसकता हुआ 
यह सोचता हूँ कि मेरा धवल अस्तित्व पूर्ण कालिक कब होगा !!!

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता में व्यापक संदेश निहित है। इसमें जो भावाभिव्यक्ति हुई है उससे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में व्याप्त विरोधाभास रेखांकित हुए हैं। यह इस रचना की सार्थकता है। पाठक के चिंतन को झकझोरने वाली रचना के लिए साधुवाद!
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  2. सुंदर रचना ...विचारों की गहन अभिव्यक्ति

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  3. सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति ..बधाई.

    'शब्द-सृजन की ओर' पर भी आपका स्वागत है.

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  4. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया अच्छा लगा
    ह्रदय से आभार ,इस अप्रतिम रचना के लिए...

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  5. .

    और मैं गहन कारागार में बंद होकर सिसकता हुआ
    यह सोचता हूँ कि मेरा धवल अस्तित्व पूर्ण कालिक कब होगा !!!

    बहुत ही गहन चिंतन ! मन मस्तिष्क को मथ गयी ये रचना।

    .

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  6. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
    पिछले कई दिनों से कहीं कमेंट भी नहीं कर पाया क्योंकि 3 दिन तो दिल्ली ही खा गई हमारे ब्लॉगिंग के!

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