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बुधवार, 23 मार्च 2011

बेरुखी जब हद से गुजर जाए

फूलों से दामन फेर कर कांटो से उलझ जाओ तो मैं क्या करूं
खुशबू को बिसरा कर राह की ख़ाक उठा लाओ तो मैं क्या करूं!!
          तेरी राह के पत्थर अपनी पलकों से चुने हमने 
          तुम फिर भी टकरा जाओ तो मैं क्या करूं !! 
तेरे जख्म अपने हाथो से सिये हमने 
तुम फिर से ठोकर खाओ तो मैं क्या करूं !!
          मेरे गम की खुली किताब से वाकिफ़ हो 
           तुम फिर भी मुस्कुराओ तो मैं क्या करूं !!
तुम्हे सदा दिल के करीब जाना है हमने 
तुम पास से गुजर जाओ तो मैं क्या करूं !!
              तेरी आहट के सामने भी सजदे किये हमने 
               तुम नजरे न मिलाओ तो मैं क्या करूं !!
तेरे घर को सब बलाओं से बचाया है हमने 
तुम अपने हाथों से जलाओ तो मैं  क्या करूं !!
               अपनी तमाम उम्र तुम पर निसार कर दी है हमने 
                तुम अपनी कब्र अपने हाथों से सजाओ तो मैं क्या करूं !!

2 टिप्‍पणियां:

  1. तेरी राह के पत्थर अपनी पलकों से चुने हमने
    तुम फिर भी टकरा जाओ तो मैं क्या करूं !!
    तेरे जख्म अपने हाथो से सिये हमने
    तुम फिर से ठोकर खाओ तो मैं क्या करूं

    बहुत खूबसूरती से लिखे जज़्बात ...

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  2. bahut khoobsurat bhaav hai aur aapki soch umeedon ki taraf ishara karti hai.

    aap hamne ki jagah maine ka prayog karte to jyada flow hota. meri bat buri lage to maafi chaahungi.

    aapne mere blog par jo rev. diya mujhe bahut pasand aaya. shukriya.

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