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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

परिणय डोरी


हिय कँवल कब तक खिलेंगे लोचन की बंद तिजोरी में


तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में!!




सुध बुध भूला मन थके नयन बाँट जोहेते राहों में


तू ले चल मुझको डोली में सम्मोहन की बांहों में !!




पायल छेडे कंगना छेडे सखियाँ छेडे बरजोरी में


अंगीकार करो सर्वस्व समर्पण क्या रखा है चोरी में



प्रीत करे और मर्म ना जाने क्या बात है चाँद चकोरी में


तू ले चल मुझको संग पिया अब बाँध परिणय डोरी में !!

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर तथा हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति है!
    --
    माँ सब जग की मनोकामना पूर्ण करें!
    जय माता दी!

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