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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

सोलहवां सावन

सोलहवां सावन
न जाने कब सोलहवां सावन आया
रिम झिम बरसे बादल
हाथों की चूड़ी लगी कसने
औछा पड़ने लगा आँचल !
        कब गुडिया लगी चिढाने
        ओर गुड्डे लगे मन को भाने
        दादी के किस्से फीके  पड़ गए  
        प्रेम कहानी लगी रिझाने !
कब आँखों से नींदे लुट गई
ओर सपनो ने घर बसाया
लोरी का अब चला न जादू
जाने क्यों ये मन बौराया !
         सयाने हुए कब  संगी-साथी
        ओर मेरी बचपन की सखियाँ
         छूटी लुकाछिपी आँख मिचौली
        भाने लगी कानों की बतियाँ !
फिर एसा वो दिन भी आया
माँ का आँगन हुआ पराया
वो लम्हे वो कल की बातें
बन गई मन की मीठी यादें !!
        

1 टिप्पणी:

  1. प्रीत की और रीत की मनुहार की बातें करें!
    प्यार का मौसम है आओ प्यार की बातें करें!!
    --
    बहुत सुन्दर रचना!
    प्रशंसा के लिए शब्द छोटे पड़ रहे हैं!

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