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शनिवार, 2 अप्रैल 2016

होली पर दोहा गीत 'सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर'



 सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर


सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर
पिचकारी के मेह में,भीगे मन का मोर

होली के सद्भाव में ,मुखड़े मिले अनेक
नीले पीले रंग से ,हो जाते सब एक
एक सूत्र में बाँधती,कई रंग की  डोर 
सतरंगी  चुनरी पहन,आई फागुन भोर

द्वेष क्लेश का त्याग ही,होली मूल प्रतीक
लोग भुलाकर तल्खियाँ,आ जाएँ नजदीक
 ढोली ढपड़े संग में ,हुड्दंगों के शोर  
सतरंगी  चुनरी पहन,आई फागुन भोर


उपजी मन में भावना,शुद्द पर्व की साथ 
प्रेम रंग से जुड़ गए,शत शत जोड़े हाथ
फीके फीके रंग ले ,कौन गया चितचोर  
सतरंगी  चुनरी पहन,आई फागुन भोर


 सच्चाई की जीत हो,यही पर्व का मर्म 
जलती होली में मिटें ,सबके पाप अधर्म
सच्चाई से ही बँधा ,मृत्य लोक का छोर
सतरंगी  चुनरी पहन,आई फागुन भोर

राजेश कुमारी  

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (05-04-2016) को "जय बोल, कुण्डा खोल" (चर्चा अंक-2303) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत आभार आ० शास्त्री जी

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  2. होली के सद्भाव में ,मुखड़े मिले अनेक
    नीले पीले रंग से ,हो जाते सब एक
    एक सूत्र में बाँधती,कई रंग की डोर
    सतरंगी चुनरी पहन,आई फागुन भोर

    वाह ! सुंदर शब्दों से होली की सच्ची तस्वीर..

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  3. really very nice, visit the highlighted text for few of my favorite Kavitayen

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