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बुधवार, 15 सितंबर 2010

अब क्या है जीवन के पार


जाना है क्षितिज के पार


आ मुझको पर देदे उधार


सुदूर गगन में मै भी जाऊं


बकुल मेखला में जुड़ जाऊं .


करूँ वहां अठ्खेलियन


जहाँ स्वछंदता अपरम्पार


आ मुझको पर देदे उधार .




शशि रवि की किरने लेकर


पवन अगन के संग खेलूं


अम्बर घट को विच्छेदित कर


उदक बूँद पंखों में भर लूं


परी लोक में हो आहार .


आ मुझको पर देदे उधार .


गहन घाटिओं के गुंजन पर कान धरूँ


अपने संगीत की गूँज सुनु


सर्वोन्नत चोटी को छूकर


फिर चहुँ और आलोकन करूँ


अब क्या है जीवन के पार


आ मुझको पर देदे उधार .

3 टिप्‍पणियां:

  1. जाना है क्षितिज के पार !
    आ , मुझको पर देदे उधार !!


    सुंदर सरस भावों के साथ सहज संप्रेषणीय रचना के लिए आभार एवम् बधाई !

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-09-2014) को "उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए" (चर्चा मंच 1730) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं