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शनिवार, 22 मई 2010

मुझको दुनिया में आने दो

मैं  तेरी  धरा का बीज हूँ माँ
मुझको पौधा बन जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
मुझको दुनिया में आने दो
.        
      मैं तेरे मातृत्व का सन्मान    
      नहीं कोई शगल का परिणाम
      मेरा अस्तित्व तेरा दर्प है
      मुझमे निहित सारा संसार .


गहन तरु की छाया में 
लघु अंकुर को पनपने दो  
      नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
      मुझको दुनिया में आने दो .


जंगल उपवन खलियानों में
हर नस्ल के पुहुप महकते हैं
स्वछंद परिंदों के नीड़ो में
दोनों ही लिंग चहकते हैं .
      प्रकर्ति के इस समन्वय का
      उच्छेदन मत हो जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे एसा
मुझको दुनिया में आने दो .      


                     समाज की घ्रणित चालों से माँ
                     तुझको ही लड़ना होगा
                      नारी अस्तित्व के कंटक का
                     मूलोच्छेदन करना होगा .
 तेरे ढूध पर  मेरा भी हक है
दुनिया को ये समझाने दो
नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा 
मुझको दुनिया में आने दो ..    




मुझको दुनिया में आने दो

5 टिप्‍पणियां:

  1. समाज की घ्रणित चालों से माँ
    तुझको ही लड़ना होगा
    नारी अस्तित्व के कंटक का
    मूलोच्छेदन करना होगा .
    तेरे ढूध पर मेरा भी हक है
    दुनिया को ये समझाने दो
    नहीं खोट कोई मुझमे ऐसा
    मुझको दुनिया में आने दो ..

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  2. khot to khote maa-baap mein hota hai..jo is dard ko nahi samjh paate..
    bahut badiya marmsparshi..
    aabhar!

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  3. सामाजिक समस्या पर अच्छी प्रस्तुति
    सराहनीय प्रयास

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  4. कल 04/07/2012 को आपके ब्‍लॉग की प्रथम पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    '' जुलाई का महीना ''

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