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रविवार, 7 नवंबर 2010

pashchataap ke aansu

कल हथेली पे मेरी आंसू गिरा गया कोई
जैसे बरसों की चुभन दिल से मिटा गया कोई ,
बिछाये थे जिसने गुरूर के पत्थर
अपनी ही ठोकर से हटा गया कोई !
जला रखी थी दिलों में जो लो नफरत की,
जाते हुए खुद ही बढ़ा गया कोई
ये कोई भ्रम था न ही कोई सपना
हकीकत से पर्दा हटा गया कोई !
लटक रही थी अधर में कब से जो,
दोस्ती की डोर फिर से थमा गया कोई !!

2 टिप्‍पणियां:

  1. लटक रही थी अधर में कब से जो,
    दोस्ती की डोर फिर से थमा गया कोई !!
    --
    आसा के सुमन खिलाती हुई,
    बहुत ही शानदार गजल है!

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  2. ये कोई भ्रम था न ही कोई सपना
    हकीकत से पर्दा हटा गया कोई !
    बड़ी हकीकत परक पंक्तियाँ ..... बेहतरीन

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